महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 343, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतच्च पश्यामि गोविन्द यत् ते रूपं सनातनम् । सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥ ६ ॥ गोविन्द! आपका जो सनातन रूप है, उसे भी मैं देख रहा हूँ। आपने ही अत्यन्त तेजस्वी वायुका रूप धारण करके ऊपरके सातों लोकोंको व्याप्त कर रखा है ॥ ६ ॥ दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा । दिशो भुजा रविश्चक्षुर्वीर्ये शुक्रः प्रतिष्ठितः ॥ ७ ॥ स्वर्गलोक आपके मस्तकसे और वसुन्धरा देवी आपके पैरोंसे व्याप्त हैं। दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं। सूर्य नेत्र हैं और शुक्राचार्य आपके वीर्यमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ७ ॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । वपुर्ह्यनुमिमीमस्ते मेघस्येव सविद्युतः ॥ ८ ॥ आपका श्रीविग्रह तीसीके फूलकी भाँति श्याम है। उसपर पीताम्बर शोभा दे रहा है, वह कभी अपनी महिमासे च्युत नहीं होता। उसे देखकर हम अनुमान करते हैं कि बिजलीसहित मेघ शोभा पा रहा है ॥ ८ ॥ त्वत्प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे । यच्छ्रेयः पुण्डरीकाक्ष तद् ध्यायस्व सुरोत्तम ॥ ९ ॥ मैं आपकी शरणमें आया हुआ आपका भक्त हूँ, और अभीष्ट गतिको प्राप्त करना चाहता हूँ। कमलनयन! सुरश्रेष्ठ! मेरे लिये जो कल्याणकारी उपाय हो उसीका संकल्प कीजिये ॥ ९ ॥
वासुदेव उवाच यतः खलु परा भक्तिर्मयि ते पुरुषर्षभ । ततो मया वपुर्दिव्यं त्वयि राजन् प्रदर्शितम् ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण बोले—राजन्! पुरुषप्रवर! मुझमें आपकी पराभक्ति है। इसीलिये मैंने आपको अपने दिव्य स्वरूपका दर्शन कराया है ॥ १० ॥ न ह्यभक्ताय राजेन्द्र भक्तायानृजवे न च । दर्शयाम्यहमात्मानं न चाशान्ताय भारत ॥ ११ ॥ भारत! राजेन्द्र! जो मेरा भक्त नहीं है अथवा भक्त होनेपर भी सरल स्वभावका नहीं है। जिसके मनमें शान्ति नहीं है, उसे मैं अपने स्वरूपका दर्शन नहीं कराता ॥ ११ ॥ भवांस्तु मम भक्तश्च नित्यं चार्जवमास्थितः । दमे तपसि सत्ये च दाने च निरतः शुचिः ॥ १२ ॥ आप मेरे भक्त तो हैं ही। आपका स्वभाव भी सरल है। आप इन्द्रिय-संयम, तपस्या, सत्य और दानमें तत्पर रहनेवाले तथा परम पवित्र हैं ॥ १२ ॥ अर्हस्त्वं भीष्म मां द्रष्टुं तपसा स्वेन पार्थिव ।