महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै॥ ६॥ न च मे प्रतिभा काचिदस्ति किंचित् प्रभाषितुम्। पीड्यमानस्य गोविन्द विषानलसमैः शरैः॥ ७॥ ‘गोविन्द! ये बाण विष और अग्निके समान मुझे निरन्तर पीड़ा दे रहे हैं; अतः मुझमें कुछ भी कहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है॥ ७॥
बलं मे प्रजहातीव प्राणाः संत्वरयन्ति च। मर्माणि परितप्यन्ति भ्रान्तचित्तस्तथा ह्यहम्॥ ८॥ ‘मेरा बल शरीरको छोड़ता-सा जान पड़ता है। ये प्राण निकलनेको उतावले हो रहे हैं। मेरे मर्मस्थानोंमें बड़ी पीड़ा हो रही है; अतः मेरा चित्त भ्रान्त हो गया है॥
दौर्बल्यात् सज्जते वाङ् मे स कथं वक्तुमुत्सहे। साधु मे त्वं प्रसीदस्व दाशार्हकुलवर्धन॥ ९॥ ‘दुर्बलताके कारण मेरी जीभ तालूमें सट जाती है, ऐसी दशामें मैं कैसे बोल सकता हूँ? दशार्हकुलकी वृद्धि करनेवाले प्रभो! आप मुझपर पूर्णरूपसे प्रसन्न हो जाइये॥ ९॥
तत् क्षमस्व महाबाहो न ब्रूयां किंचिदच्युत। त्वत्संनिधौ च सीदेद्धि वाचस्पतिरपि ब्रुवन्॥ १०॥ ‘महाबाहो! क्षमा कीजिये। मैं बोल नहीं सकता। आपके निकट प्रवचन करनेमें बृहस्पतिजी भी शिथिल हो सकते हैं; फिर मेरी क्या बिसात है?॥ १०॥
न दिशः सम्प्रजानामि नाकाशं न च मेदिनीम्। केवलं तव वीर्येण तिष्ठामि मधुसूदन॥ ११॥ ‘मधुसूदन! मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान है और न आकाश एवं पृथ्वीका ही भान हो रहा है। केवल आपके प्रभावसे ही जी रहा हूँ॥ ११॥
स्वयमेव भवांस्तस्माद् धर्मराजस्य यद्धितम्। तद् ब्रवीत्वाशु सर्वेषामागमानां त्वमागमः॥ १२॥ ‘इसलिये आप स्वयं ही जिसमें धर्मराजका हित हो, वह बात शीघ्र बताइये; क्योंकि आप शास्त्रोंके भी शास्त्र हैं॥ १२॥
कथं त्वयि स्थिते कृष्णे शाश्वते लोककर्तरि। प्रब्रूयान्मद्विधः कश्चिद् गुरौ शिष्य इव स्थिते॥ १३॥ ‘श्रीकृष्ण! आप जगत्के कर्ता और सनातन पुरुष हैं। आपके रहते हुए मेरे-जैसा कोई भी मनुष्य कैसे उपदेश कर सकता है? क्या गुरुके रहते हुए शिष्य उपदेश देनेका अधिकारी है?’॥ १३॥
वासुदेव उवाच
उपपन्नमिदं वाक्यं कौरवाणां धुरन्धरे।