महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे धर्मपरायण महर्षि, 'हमलोग फिर कल सबेरे यहाँ आयेंगे' ऐसा कहकर तुरंत ही अपने-अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।। २९ ।। तथैवामन्त्र्य गाङ्गेयं केशवः पाण्डवास्तथा । प्रदक्षिणमुपावृत्य रथानारुरुहुः शुभान् ।। ३० ।। इसी प्रकार श्रीकृष्ण और पाण्डव भी गङ्गानन्दन भीष्मजीसे जानेकी आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके अपने मङ्गलमय रथोंपर जा बैठे ।। ३० ।। ततो रथैः काञ्चनचित्रकूबरै- र्महीधराभैः समदैश्च दन्तिभिः । हयैः सुपर्णैरिव चाशुगामिभिः पदातिभिश्चात्तशरासनादिभिः ।। ३१ ।। ययौ रथानां पुरतो हि सा चमू- स्तथैव पश्चादतिमात्रसारिणी । पुरश्च पश्चाच्च यथा महानदी तमृक्षवन्तं गिरिमेत्य नर्मदा ।। ३२ ।। सुवर्णनिर्मित विचित्र कूबरोंवाले रथों, पर्वताकार मतवाले हाथियों, गरुड़के समान तीव्रगतिसे चलनेवाले घोड़ों तथा हाथमें धनुष-बाण आदि लिये हुए पैदल सैनिकोंसे युक्त वह विशाल सेना रथोंके आगे और पीछे भी बहुत दूरतक फैलकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे ऋक्षवान् पर्वतके पास पहुँचकर पूर्व और पश्चिम दिशामें भी प्रवाहित होनेवाली महानदी नर्मदा सुशोभित होती है ।। ३१-३२ ।। ततः पुरस्ताद् भगवान् निशाकरः समुत्थितस्तामभिहर्षयंश्चमूम् । दिवाकरापीतरसा महौषधीः पुनः स्वकेनैव गुणेन योजयन् ।। ३३ ।। इसके बाद पूर्व दिशाके आकाशमें भगवान् चन्द्रदेवका उदय हुआ, जो उस सेनाका हर्ष बढ़ा रहे थे और सूर्यने जिन बड़ी-बड़ी ओषधियोंका रस पी लिया था, उन सबको अपनी सुधावर्षी किरणों-द्वारा पुनः उनके स्वाभाविक गुणोंसे सम्पन्न कर रहे थे ।। ३३ ।। ततः पुरं सुरपुरसम्मितद्युति प्रविश्य ते यदुवृषपाण्डवास्तदा । यथोचितान् भवनवरान् समाविशन् श्रमान्विता मृगपतयो गुहा इव ।। ३४ ।। तदनन्तर वे यदुकुलके श्रेष्ठ वीर तथा पाण्डव सुरपुरके समान शोभा पानेवाले हस्तिनापुरमें प्रवेश करके यथायोग्य श्रेष्ठ महलोंके भीतर चले गये। ठीक उसी तरह, जैसे थके-मांदे सिंह विश्रामके लिये पर्वतकी कन्दराओंमें प्रवेश करते हैं ।। ३४ ।।