भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 354

युधिष्ठिर उवाच

युज्यतां मे रथवरः फाल्गुनाप्रतिमद्युते ।। १४ ।।
न सैनिकैश्च यातव्यं यास्यामो वयमेव हि ।
न च पीडयितव्यो मे भीष्मो धर्मभृतां वरः ।। १५ ।।
अतः पुरःसराश्चापि निवर्तन्तु धनंजय ।
युधिष्ठिर बोले— अनुपम तेजस्वी अर्जुन! मेरा श्रेष्ठ रथ जोतकर तैयार कराओ। आज सैनिकोंको हमारे साथ नहीं जाना चाहिये। केवल हमलोगोंको ही चलना है। धनंजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको अधिक भीड़ बढ़ाकर कष्ट देना उचित नहीं है। अतः आगे चलनेवाले सैनिकोंको भी जानेके लिये मना कर देना चाहिये ।। १४-१५½ ।।

अद्यप्रभृति गाङ्गेयः परं गुह्यं प्रवक्ष्यति ।। १६ ।।
अतो नेच्छामि कौन्तेय पृथग्जनसमागमम् ।
कुन्तीनन्दन! आजसे गङ्गाकुमार भीष्मजी धर्मके अत्यन्त गूढ़ रहस्यका उपदेश करेंगे। अतः मैं भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले साधारण जनसमाजको वहाँ नहीं जुटाना चाहता ।। १६½ ।।

वैशम्पायन उवाच

स तद्वाक्यमथाज्ञाय कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। १७ ।।
युक्तं रथवरं तस्मा आचचक्षे नरर्षभः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके कुन्तीकुमार नरश्रेष्ठ अर्जुनने वैसा ही किया। फिर आकर उन्हें सूचना दी कि महाराजका श्रेष्ठ रथ तैयार है ।। १७½ ।।

ततो युधिष्ठिरो राजा यमौ भीमार्जुनावपि ।। १८ ।।
भूतानीव समस्तानि ययुः कृष्णनिवेशनम् ।
तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब एक रथपर आरूढ़ हो श्रीकृष्णके निवासस्थानपर गये, मानो समस्त महाभूत मूर्तिमान् होकर पधारे हों ।। १८½ ।।

आगच्छत्स्रथ कृष्णोऽपि पाण्डवेषु महात्मसु ।। १९ ।।
शैनेयसहितो धीमान् रथमेवान्वपद्यत ।
महात्मा पाण्डवोंके पदार्पण करनेपर सात्यकिसहित बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण भी एक ही रथपर आरूढ़ हो गये ।। १९½ ।।

रथस्थाः संविदं कृत्वा सुखां पृष्ट्वा च शर्वरीम् ।। २० ।।
मेघघोषै रथवरैः प्रययुस्ते नरर्षभाः ।