महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘ओ मूढ! जैसे असावधान होकर तूने इस गौका वध किया है, उसी प्रकार असावधान-अवस्था में ही शत्रु तेरा सिर काट डालेगा’ ॥ २६ ॥
शप्तः प्रसादयामास कर्णस्तं द्विजसत्तमम् ।
गोभिर्धनैश्च रत्नैश्च स चैनं पुनरब्रवीत् ॥ २७ ॥
इस प्रकार शाप प्राप्त होनेपर कर्णने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको बहुत-सी गौएँ, धन और रत्न देकर उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। तब उसने फिर इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २७ ॥
न हि मेऽव्याहृतं कुर्यात् सर्वलोकोऽपि केवलम् ।
गच्छ वा तिष्ठ वा यद् वा कार्यं ते तत् समाचर ॥ २८ ॥
‘सारा संसार आ जाय तो भी कोई मेरी बातको झूठी नहीं कर सकता। तू यहाँसे जा या खड़ा रह अथवा तुझे जो कुछ करना हो, वह कर ले’ ॥ २८ ॥
इत्युक्तो ब्राह्मणेनाथ कर्णो दैन्यादधोमुखः ।
राममभ्यगमद् भीतस्तदेव मनसा स्मरन् ॥ २९ ॥
ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर कर्णको बड़ा भय हुआ। उसने दीनतावश सिर झुका लिया। वह मन-ही-मन उस बातका चिन्तन करता हुआ परशुरामजीके पास लौट आया ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कर्णशापो नाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कर्णको ब्राह्मणका शापनामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
* कर्णपर्वमें भी यह प्रसंग आया है, वहाँ कर्णके द्वारा बछड़ेके मारे जानेका उल्लेख है; अतः यहाँ भी होमधेनुका बछड़ा ही समझना चाहिये।