भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

दैवतान्यर्चयित्वा हि ब्राह्मणांश्च कुरूद्वह । आनृण्यं याति धर्मस्य लोकेन च समर्च्यते ।। १३ ।। कुरुकुलभूषण! देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन करके राजा धर्मके ऋणसे मुक्त होता है और सारा जगत् उसका सम्मान करता है ।। १३ ।।

उत्थानेन सदा पुत्र प्रयतेथा युधिष्ठिर । न ह्युत्थानमृते दैवं राज्ञामर्थं प्रसादयेत् ।। १४ ।। बेटा युधिष्ठिर! तुम सदा पुरुषार्थके लिये प्रयत्नशील रहना। पुरुषार्थके बिना केवल प्रारब्ध राजाओंका प्रयोजन नहीं सिद्ध कर सकता ।। १४ ।।

साधारणं द्वयं ह्येतद् दैवमुत्थानमेव च । पौरुषं हि परं मन्ये दैवं निश्चितमुच्यते ।। १५ ।। यद्यपि कार्यकी सिद्धिमें प्रारब्ध और पुरुषार्थ—ये दोनों साधारण कारण माने गये हैं, तथापि मैं पुरुषार्थको ही प्रधान मानता हूँ। प्रारब्ध तो पहलेसे ही निश्चित बताया गया है ।। १५ ।।

विपन्ने च समारम्भे संतापं मा स्म वै कृथाः । घटस्वैव सदाऽऽत्मानं राज्ञामेष परो नयः ।। १६ ।। अतः यदि आरम्भ किया हुआ कार्य पूरा न हो सके अथवा उसमें बाधा पड़ जाय तो इसके लिये तुम्हें अपने मनमें दुःख नहीं मानना चाहिये। तुम सदा अपने आपको पुरुषार्थमें ही लगाये रखो। यही राजाओंकी सर्वोत्तम नीति है ।। १६ ।।

न हि सत्यादृते किंचिद् राज्ञां वै सिद्धिकारकम् । सत्ये हि राजा निरतः प्रेत्य चेह च नन्दति ।। १७ ।। सत्यके सिवा दूसरी कोई वस्तु राजाओंके लिये सिद्धिकारक नहीं है। सत्यपरायण राजा इहलोक और परलोकमें भी सुख पाता है ।। १७ ।।

ऋषीणामपि राजेन्द्र सत्यमेव परं धनम् । तथा राज्ञां परं सत्यान्नान्यद् विश्वासकारणम् ।। १८ ।। राजेन्द्र! ऋषियोंके लिये भी सत्य ही परम धन है। इसी प्रकार राजाओंके लिये सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा साधन नहीं है, जो प्रजावर्गमें उसके प्रति विश्वास उत्पन्न करा सके ।। १८ ।।

गुणवान् शीलवान् दान्तो मृदुर्धर्म्यो जितेन्द्रियः । सुदर्शः स्थूललक्ष्यश्च न भ्रश्येत सदा श्रियः ।। १९ ।। जो राजा गुणवान्, शीलवान्, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाला, कोमलस्वभाव, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय, देखनेमें प्रसन्नमुख और बहुत देनेवाला उदारचित्त है, वह कभी राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट नहीं होता ।। १९ ।।

आर्जवं सर्वकार्येषु श्रयेथाः कुरुनन्दन ।