महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 376, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधनके निमित्त राजसभामें ही राजाके साथ विवाद करने लगते हैं।। ५६ ।। विस्रंसयन्ति मन्त्रं च विवृण्वन्ति च दुष्कृतम्। लीलया चैव कुर्वन्ति सावज्ञास्तस्य शासनम्॥ ५७॥ राजकीय गुप्त बातों तथा राजाके दोषोंको भी दूसरों पर प्रकट कर देते हैं। राजाके आदेशकी अवहेलना करके खिलवाड़ करते हुए उसका पालन करते हैं।। ५७ ।। अलंकारे च भोज्ये च तथा स्नानानुलेपने। हेलनानि नरव्याघ्र स्वस्थास्तस्योपशृण्वतः॥ ५८ ॥ पुरुषसिंह! राजा पास ही खड़ा-खड़ा सुनता रहता है निर्भय होकर उसके आभूषण पहनने, खाने, नहाने और चन्दन लगाने आदिका मजाक उड़ाया करते हैं।। ५८ ।। निन्दन्ते स्वानधिकारान् संत्यजन्ते च भारत। न वृत्त्या परितुष्यन्ति राजदेयं हरन्ति च॥ ५९॥ भारत! उनके अधिकारमें जो काम सौंपा जाता है, उसको वे बुरा बताते और छोड़ देते हैं। उन्हें जो वेतन दिया जाता है, उससे वे संतुष्ट नहीं होते हैं और राजकीय धनको हड़पते रहते हैं।। ५९ ।। क्रीडितुं तेन चेच्छन्ति ससूत्रेणेव पक्षिणा। अस्मत्प्रणेयो राजेति लोकांश्चैव वदन्त्युत॥ ६०॥ जैसे लोग डोरेमें बँधी हुई चिड़ियाके साथ खेलते हैं, उसी प्रकार वे भी राजाके साथ खेलना चाहते हैं और साधारण लोगोंसे कहा करते हैं कि 'राजा तो हमारा गुलाम है'।। ६० ।। एते चैवापरे चैव दोषाः प्रादुर्भवन्त्युत। नृपतौ मार्दवोपेते हर्षुले च युधिष्ठिर॥ ६१॥ युधिष्ठिर! राजा जब परिहासशील और कोमल-स्वभावका हो जाता है, तब ये ऊपर बताये हुए तथा दूसरे दोष भी प्रकट होते हैं।। ६१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ।। ५६ ।।
* व्यसन अठारह प्रकारके बताये गये हैं। इनमें दस तो कामज हैं, और आठ क्रोधज। शिकार, जूआ, दिनमें सोना, परनिन्दा, स्त्रीसेवन, मद, वाद्य, गीत, नृत्य और मदिरापान—ये दस कामज व्यसन बताये गये हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता—ये आठ क्रोधज व्यसन कहे गये हैं।