भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 387

युधिष्ठिर! राज्य सबके उपभोगकी वस्तु है; अतः सदा सरल भावसे ही उसकी सँभाल की जा सकती है। इसलिये राजामें क्रूरता और कोमलता दोनों भावोंका सम्मिश्रण होना चाहिये ॥ २२ ॥ यद्यप्यस्य विपत्तिः स्याद् रक्षमाणस्य वै प्रजाः । सोऽप्यस्य विपुलो धर्म एवंवृत्ता हि भूमिपाः ॥ २३ ॥ प्रजाकी रक्षा करते हुए राजाके प्राण चले जायें तो भी वह उसके लिये महान् धर्म है। राजाओंके व्यवहार और बर्ताव ऐसे ही होने चाहिये ॥ २३ ॥ एष ते राजधर्माणां लेशः समनुवर्णितः । भूयस्ते यत्र संदेहस्तद् ब्रूहि कुरुसत्तम ॥ २४ ॥ कुरुश्रेष्ठ! यह मैंने तुम्हारे सामने राजधर्मोंका लेशमात्र वर्णन किया है। अब तुम्हें जिस बातमें संदेह हो, वह पूछो ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो व्यासश्च भगवान् देवस्थानोऽश्म एव च । वासुदेवः कृपश्चैव सात्यकिः संजयस्तथा ॥ २५ ॥ साधु साध्विति संहृष्टाः पुष्यमाणैरिवाननैः । अस्तुवंश्च नरव्याघ्रं भीष्मं धर्मभृतां वरम् ॥ २६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीका यह वक्तव्य सुनकर भगवान् व्यास, देवस्थान, अश्म, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, कृपाचार्य, सात्यकि और संजय बड़े प्रसन्न हुए और हर्षसे खिले हुए मुखोंद्वारा साधुवाद देते हुए धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह भीष्मजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ २५-२६ ॥ ततो दीनमना भीष्ममुवाच कुरुसत्तमः । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पादौ तस्य शनैःस्पृशन् ॥ २७ ॥ श्व इदानीं स्वसन्देहं प्रक्ष्यामि त्वां पितामह । उपैति सविता ह्यस्तं रसमापीय पार्थिवम् ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने मन-ही-मन दुखी हो दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर धीरेसे भीष्मजीके चरण छुए और कहा—'पितामह! इस समय भगवान् सूर्य अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीके रसका शोषण करके अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये अब मैं कल आपसे अपना संदेह पूछूँगा' ॥ ततो द्विजातीनभिवाद्य केशवः कृपश्च ते चैव युधिष्ठिरादयः । प्रदक्षिणीकृत्य महानदीसुतं ततो रथानारुरुहुर्मुदान्विताः ॥ २९ ॥