भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 396

पीड़ा चापदकालश्च पत्तिज्ञानं च पाण्डव ॥ ४७ ॥ पाण्डुकुमार! विपत्तिसे सेनाओंका उद्धार करना, सैनिकोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाना, पीड़ा और आपत्तिके समय पैदल सैनिकोंकी स्वामिभक्तिकी परीक्षा करना—इन सब बातोंका उस शास्त्रमें वर्णन किया गया है ॥ ४७ ॥ तथा खातविधानं च योगः संचार एव च । चोरैराटविकैश्चोग्रैः परराष्ट्रस्य पीड़नम् ॥ ४८ ॥ अग्निदैर्गरदैश्चैव प्रतिरूपककारकैः । श्रेणिमुख्योपजापेन वीरुधश्छेदनेन च ॥ ४९ ॥ दूषणेन च नागानामातङ्कजननेन च । आराधनेन भक्तस्य प्रत्ययोपार्जनेन च ॥ ५० ॥ दुर्गके चारों ओर खाई खुदवाना, सेनाका युद्धके लिये सुसज्जित होना तथा रणयात्रा करना, चोरों और भयानक जंगली लुटेरोंद्वारा शत्रुके राष्ट्रको पीड़ा देना, आग लगानेवाले, जहर देनेवाले, छद्मवेशधारी लोगोंद्वारा भी शत्रुको हानि पहुँचाना तथा एक-एक शत्रुदलके प्रधान-प्रधान लोगोंमें भेद उत्पन्न करना, फसल और पौधोंको काट लेना, हाथियोंको भड़काना, लोगोंमें आतङ्क उत्पन्न करना, शत्रुओंमें अनुरक्त पुरुषको अनुनय आदिके द्वारा फोड़ लेना और शत्रुपक्षके लोगोंमें अपने प्रति विश्वास उत्पन्न कराना आदि उपायोंसे शत्रुके राष्ट्रको पीड़ा देनेकी कलाका भी ब्रह्माजीके उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है ॥ ४८—५० ॥ सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमञ्जसम् । दूतसामर्थ्यसंयोगात् सराष्ट्रस्य विवर्धनम् ॥ ५१ ॥ अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक् चोक्तं प्रपञ्चनम् । अवमर्दः प्रतीघातस्तथैव च बलीयसाम् ॥ ५२ ॥ सात अङ्गोंसे युक्त राज्यके ह्रास, वृद्धि और समान भावसे स्थिति, दूतके सामर्थ्यसे होनेवाली अपनी और अपने राष्ट्रकी वृद्धि, शत्रु, मित्र और मध्यस्थोंका विस्तारपूर्वक सम्यक् विवेचन, बलवान् शत्रुओंको कुचल डालने तथा उनसे टक्कर लेनेकी विधि आदिका उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है ॥ ५१-५२ ॥ व्यवहारः सुसूक्ष्मश्च तथा कण्टकशोधनम् । श्रमो व्यायामयोगश्च त्यागो द्रव्यस्य संग्रहः ॥ ५३ ॥ शासनसम्बन्धी अत्यन्त सूक्ष्म व्यवहार, कण्टक-शोधन (राज्यकार्यमें विघ्न डालनेवालेको उखाड़ फेंकना), परिश्रम, व्यायाम-योग तथा धनके त्याग और संग्रहका भी उसमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ५३ ॥ अभृतानां च भरणं भृतानां चान्ववेक्षणम् । अर्थस्य काले दानं च व्यसने चाप्रसङ्गिता ॥ ५४ ॥

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