महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च । नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरेषा प्रभाविता ॥ ७६ ॥ 'देवगण! सम्पूर्ण जगत्के उपकार तथा धर्म, अर्थ एवं कामकी स्थापनाके लिये वाणीका सारभूत यह विचार यहाँ प्रकट किया गया ॥ ७६ ॥ दण्डेन सहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका । निग्रहानुग्रहरता लोकाननुचरिष्यति ॥ ७७ ॥ 'दण्ड-विधानके साथ रहनेवाली यह नीति सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाली है। यह दुष्टोंके निग्रह और साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रहमें तत्पर रहकर सम्पूर्ण जगत्में प्रचलित होगी ॥ ७७ ॥ दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः । दण्डनीतिरिति ख्याता त्रीँल्लोँकानभिवर्तते ॥ ७८ ॥ 'इस शास्त्रके अनुसार दण्डके द्वारा जगत्का सन्मार्गपर स्थापन किया जाता है अथवा राजा इसके अनुसार प्रजावर्गमें दण्डकी स्थापना करता है; इसलिये यह विद्या दण्डनीतिके नामसे विख्यात है। इसका तीनों लोकोंमें विस्तार होगा ॥ ७८ ॥ षाड्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु । धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शब्दिताः ॥ ७९ ॥ 'यह विद्या संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंका सारभूत है। महात्माओंमें इसका स्थान सबसे आगे होगा। इस शास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका निरूपण किया गया है' ॥ ७९ ॥ ततस्तां भगवान् नीतिं पूर्वं जग्राह शङ्करः । बहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ८० ॥ तदनन्तर सबसे पहले भगवान् शङ्करने इस नीतिशास्त्रको ग्रहण किया। वे बहुरूप, विशालाक्ष, शिव, स्थाणु, उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ८० ॥ प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः । संचिक्षेप ततः शास्त्रं महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥ ८१ ॥ वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत । विशालाक्ष भगवान् शिवने प्रजावर्गकी आयुका ह्रास होता जानकर ब्रह्माजीके रचे हुए इस महान् अर्थसे भरे हुए शास्त्रको संक्षिप्त किया था; इसलिये इसका नाम 'वैशालाक्ष' हो गया। फिर इसे इन्द्रने ग्रहण किया ॥ ८१ ½ ॥ दशाध्यायसहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥ ८२ ॥ भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरंदरः । सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥ ८३ ॥