भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

तपस्यामें लग गये ॥ ९० ॥ प्रजापतेः कर्दमस्य त्वनङ्गो नाम वै सुतः ।
प्रजा रक्षयिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ॥ ९१ ॥
प्रजापति कर्दमके पुत्रका नाम अनङ्ग था, जो कालक्रमसे प्रजाका संरक्षण करनेमें समर्थ, साधु तथा दण्डनीतिविद्यामें निपुण हुआ ॥ ९१ ॥
अनङ्गपुत्रोऽतिबलो नीतिमानभिगम्य वै ।
प्रतिपेदे महाराज्यमथेन्द्रियवशोऽभवत् ॥ ९२ ॥
अनङ्गके पुत्रका नाम था अतिबल। वह भी नीतिशास्त्रका ज्ञाता था, उसने विशाल राज्य प्राप्त किया। राज्य पाकर वह इन्द्रियोंका गुलाम हो गया ॥ ९२ ॥
मृत्योस्तु दुहिता राजन् सुनीथा नाम मानसी ।
प्रख्याता त्रिषु लोकेषु यासौ वेनमजीजनत् ॥ ९३ ॥
राजन्! मृत्युकी एक मानसिक कन्या थी, जिसका नाम था सुनीथा। जो अपने रूप और गुणके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात थी। उसीने वेनको जन्म दिया था ॥ ९३ ॥
तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् ।
मन्त्रपूतैः कुशैर्जघ्नुर्ऋषयो ब्रह्मवादिनः ॥ ९४ ॥
वेन राग-द्वेषके वशीभूत हो प्रजाओंपर अत्याचार करने लगा। तब वेदवादी ऋषियोंने मन्त्रपूत कुशोंद्वारा उसे मार डाला ॥ ९४ ॥
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषयस्तस्य मन्त्रतः ।
ततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वाङ्गः पुरुषो भुवि ॥ ९५ ॥
फिर वे ही ऋषि मन्त्रोच्चारणपूर्वक वेनकी दाहिनी जङ्घाका मन्थन करने लगे। उससे इस पृथ्वीपर एक नाटे कदका मनुष्य उत्पन्न हुआ, जिसकी आकृति बेडौल थी ॥
दग्धस्थूणाप्रतीकाशो रक्ताक्षः कृष्णमूर्धजः ।
निषीदेत्येवमूचुस्तमृषयो ब्रह्मवादिनः ॥ ९६ ॥
वह जले हुए खम्भेके समान जान पड़ता था। उसकी आँखें लाल और काले बाल थे। वेदवादी महर्षियोंने उसे देखकर कहा— 'निषीद' बैठ जाओ ॥ ९६ ॥
तस्मान्निषादाः सम्भूताः क्रूराः शैलवनाश्रयाः ।
ये चान्ये विन्ध्यनिलया म्लेच्छाः शतसहस्रशः ॥ ९७ ॥
उसीसे पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले क्रूर निषादोंकी उत्पत्ति हुई तथा दूसरे जो विन्ध्यगिरिके निवासी लाखों म्लेच्छ थे, उनका भी प्रादुर्भाव हुआ ॥ ९७ ॥
भूयोऽस्य दक्षिणं पाणिं ममन्थुस्ते महर्षयः ।
ततः पुरुष उत्पन्नो रूपेणेन्द्र इवापरः ॥ ९८ ॥
इसके बाद फिर महर्षियोंने वेनके दाहिने हाथका मन्थन किया। उससे एक दूसरे पुरुषका प्राकट्य हुआ, जो रूपमें देवराज इन्द्रके समान थे ॥ ९८ ॥