भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

यश्चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः । तमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ।। १०७ ।। ‘वेदमें दण्डनीतिसे सम्बन्ध रखनेवाला जो नित्य धर्म बताया गया है, उसका मैं निःशंक होकर पालन करूँगा। कभी स्वच्छन्द नहीं होऊँगा’ ।। १०७ ।। अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीहि हे विभो । लोकं च संकरात्कृत्स्नं त्रातास्मीति परंतप ।। १०८ ।।