भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

करावे ॥ १३ ॥ नाध्यापयेदधीयीत प्रजाश्च परिपालयेत् । नित्योद्युक्तो दस्युवधे रणे कुर्यात् पराक्रमम् ॥ १४ ॥ वह अध्ययन करे, किंतु अध्यापक न बने, प्रजाजनोंका सब प्रकारसे पालन करता रहे। लुटेरों और डाकुओंका वध करनेके लिये सदा तैयार रहे। रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करे ॥ १४ ॥

ये तु क्रतुभिरीजानाः श्रुतवन्तश्च भूमिपाः । य एवाहवजेतारस्त एषां लोकजित्तमाः ॥ १५ ॥ इन राजाओंमें जो भूपाल बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले तथा वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं और जो युद्धमें विजय प्राप्त करनेवाले हैं, वे ही पुण्यलोकोंपर विजय प्राप्त करनेवालोंमें उत्तम हैं ॥ १५ ॥

अविक्षतेन देहेन समराद् यो निवर्तते । क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥ १६ ॥ जो क्षत्रिय शरीरपर घाव हुए बिना ही समर-भूमिसे लौट आता है, उसके इस कर्मकी पुरातन धर्मको जाननेवाले विद्वान् प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १६ ॥

एवं हि क्षत्रबन्धूनां मार्गमाहुः प्रधानतः । नास्य कृत्यतमं किंचिदन्यद् दस्युनिबर्हणात् ॥ १७ ॥ दानमध्ययनं यज्ञो राज्ञां क्षेमो विधीयते । तस्माद् राज्ञा विशेषेण योद्धव्यं धर्ममीप्सता ॥ १८ ॥ इस प्रकार युद्धको ही क्षत्रियोंके लिये प्रधान मार्ग बताया गया है, उसके लिये लुटेरोंके संहारसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठतम कर्म नहीं है। यद्यपि दान, अध्ययन और यज्ञ—इनके अनुष्ठानसे भी राजाओंका कल्याण होता है, तथापि युद्ध उनके लिये सबसे बढ़कर है; अतः विशेषरूपसे धर्मकी इच्छा रखनेवाले राजाको सदा ही युद्धके लिये उद्यत रहना चाहिये ॥ १७-१८ ॥

स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः । धर्मेण सर्वकृत्यानि शमनिष्ठानि कारयेत् ॥ १९ ॥ राजा समस्त प्रजाओंको अपने-अपने धर्मोंमें स्थापित करके उनके द्वारा शान्तिपूर्ण समस्त कर्मोंका धर्मके अनुसार अनुष्ठान करावे ॥ १९ ॥

परिनिष्ठितकार्यस्तु नृपतिः परिपालनात् । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादैन्द्रो राजन्य उच्यते ॥ २० ॥ राजा दूसरा कर्म करे या न करे, प्रजाकी रक्षा करने-मात्रसे वह कृतकृत्य हो जाता है। उसमें इन्द्र देवता-सम्बन्धी बलकी प्रधानता होनेसे राजा ‘ऐन्द्र’ कहलाता है ॥

वैश्यस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि शाश्वतम् ।