भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

राजधर्मेष्वनुमता लोकाः सुचरितैः सह । उदाहृतं ते राजेन्द्र यथा विष्णुं महौजसम् ॥ ७ ॥ सर्वभूतेश्वरं देवं प्रभुं नारायणं पुरा । जग्मुः सुबहुशः शूरा राजानो दण्डनीतये ॥ ८ ॥ राजेन्द्र! उत्तम चरित्रों (धर्मों) सहित सम्पूर्ण लोक राजधर्ममें अन्तर्भूत हैं। यह बात मैं तुमसे कह चुका हूँ। किसी समय बहुत-से शूरवीर नरेश दण्डनीतिकी प्राप्तिके लिये सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महातेजस्वी सर्वव्यापी भगवान् नारायण देवकी शरणमें गये थे ॥ ७-८ ॥

एकैकमात्मनः कर्म तुलयित्वाऽऽश्रमं पुरा । राजानः पर्युपासन्त दृष्टान्तवचने स्थिताः ॥ ९ ॥ वे पूर्वकालमें आश्रमसम्बन्धी एक-एक कर्मकी दण्डनीतिके साथ तुलना करके संशयमें पड़ गये कि इनमें कौन श्रेष्ठ है? अतः सिद्धान्त जाननेके लिये उन राजाओंने भगवान्‌की उपासना की थी ॥ ९ ॥

साध्या देवा वसवश्चाश्विनौ च रुद्राश्च विश्वे मरुतां गणाश्च । सृष्टाः पुरा ह्यादिदेवेन देवाः क्षात्रे धर्मे वर्तयन्ते च सिद्धाः ॥ १० ॥ साध्यदेव, वसुगण, अश्विनीकुमार, रुद्रगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण—ये देवता और सिद्धगण पूर्वकालमें आदिदेव भगवान् विष्णुके द्वारा रचे गये हैं, जो क्षात्रधर्ममें ही स्थित रहते हैं ॥ १० ॥

अत्र ते वर्तयिष्यामि धर्ममर्थविनिश्चयम् । निर्मर्यादे वर्तमाने दानवैकार्णवे पुरा ॥ ११ ॥ मैं इस विषयमें तात्त्विक अर्थका निश्चय करनेवाला एक धर्ममय इतिहास सुनाऊँगा। पहलेकी बात है, यह सारा जगत् दानवताके समुद्रमें निमग्न होकर उच्छृंखल हो चला था ॥ ११ ॥

बभूव राजा राजेन्द्र मान्धाता नाम वीर्यवान् । पुरा वसुमतीपालो यज्ञं चक्रे दिदृक्षया ॥ १२ ॥ अनादिमध्यनिधनं देवं नारायणं प्रभुम् । राजेन्द्र! उन्हीं दिनों मान्धाता नामसे प्रसिद्ध एक पराक्रमी पृथ्वीपालक नरेश हुए थे, जिन्होंने आदि, मध्य और अन्तसे रहित भगवान् नारायणदेवका दर्शन पानेकी इच्छासे एक यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ १२ १/२ ॥

स राजा राजशार्दूल मान्धाता परमेश्वरम् ॥ १३ ॥ जगाम शिरसा पादौ यज्ञे विष्णोर्महात्मनः । दर्शयामास तं विष्णू रूपमास्थाय वासवम् ॥ १४ ॥