महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 44, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंएते चान्ये च बहवो दक्षिणां दिशमाश्रिताः । म्लेच्छाश्चार्याश्च राजानः प्राच्योदीच्यास्तथैव च ॥ ८ ॥ ये तथा और भी बहुत-से नरेश दक्षिण दिशाकी उस राजधानीमें गये। उनमें म्लेच्छ, आर्य, पूर्व और उत्तर सभी देशोंके राजा थे ॥ ८ ॥
काञ्चनाङ्गदिनः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभाः । सर्वे भास्वरदेहाश्च व्याघ्रा इव बलोत्कटाः ॥ ९ ॥ उन सबने सोनेके बाजूबंद पहन रखे थे। सभीकी अंगकान्ति शुद्ध सुवर्णके समान दमक रही थी। सबके शरीर तेजस्वी थे और सभी व्याघ्रके समान उत्कट बलशाली थे ॥ ९ ॥
ततः समुपविष्टेषु तेषु राजसु भारत । विवेश रङ्गं सा कन्या धात्रीवर्षवरान्विता ॥ १० ॥ भारत! जब सब राजा स्वयंवर-सभामें बैठ गये, तब उस राजकन्याने धाय और खोजोंके साथ रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ १० ॥
ततः संश्राव्यमाणेषु राज्ञां नामसु भारत । अत्यक्रामद् धार्तराष्ट्रं सा कन्या वरवर्णिनी ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! तत्पश्चात् जब उसे राजाओंके नाम सुना-सुनाकर उनका परिचय दिया जाने लगा, उस समय वह सुन्दरी राजकुमारी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके सामनेसे होकर आगे बढ़ने लगी ॥ ११ ॥
दुर्योधनस्तु कौरव्यो नामर्षयत लङ्घनम् । प्रत्यषेधच्च तां कन्यामसत्कृत्य नराधिपान् ॥ १२ ॥ कुरुवंशी दुर्योधनको यह सहन नहीं हुआ कि राजकन्या उसे लाँघकर अन्यत्र जाय। उसने समस्त नरेशोंका अपमान करके उसे वहीं रोक लिया ॥ १२ ॥
स वीर्यमदमत्तत्वाद भीष्मद्रोणावुपाश्रितः । रथमारोप्य तां कन्यामाजहार नराधिपः ॥ १३ ॥ राजा दुर्योधनको भीष्म और द्रोणाचार्यका सहारा प्राप्त था; इसलिये वह बलके मदसे उन्मत्त हो रहा था। उसने उस राजकन्याको रथपर बिठाकर उसका अपहरण कर लिया ॥ १३ ॥
तमन्वगाद् रथी खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । कर्णः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः पृष्ठतः पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥ पुरुषोत्तम! उस समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण रथपर आरूढ़ हो हाथमें दस्ताने बाँधे और तलवार लिये दुर्योधनके पीछे-पीछे चला ॥ १४ ॥
ततो विमर्दः सुमहान् राज्ञामासीद् युयुत्सताम् । संनह्यतां तनुत्राणि रथान् योजयतामपि ॥ १५ ॥