भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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वेदाध्ययननित्यत्वं क्षमाथाचार्यपूजनम् । अथोपाध्यायशुश्रूषा ब्रह्मा श्रमपदं भवेत् ॥ १४ ॥ जो प्रतिदिन वेदोंका स्वाध्याय करता है, क्षमाभाव रखता है, आचार्यकी पूजा करता है और गुरुकी सेवामें संलग्न रहता है, उसे ब्रह्मा श्रम (संन्यास) द्वारा मिलनेवाला फल प्राप्त होता है ॥ १४ ॥

आह्निकं जपमानस्य देवान् पूजयतः सदा । धर्मेण पुरुषव्याघ्र धर्माश्रमपदं भवेत् ॥ १५ ॥ पुरुषसिंह! जो प्रतिदिन इष्ट-मन्त्रका जप और देवताओंका सदा पूजन करता है, उसे उस धर्मके प्रभावसे धर्माश्रमके पालनका अर्थात् गार्हस्थ्य धर्मके पालनका पुण्यफल प्राप्त होता है ॥ १५ ॥

मृत्युर्वा रक्षणं वेति यस्य राज्ञो विनिश्चयः । प्राणद्यूते ततस्तस्य ब्रह्मा श्रमपदं भवेत् ॥ १६ ॥ जो राजा युद्धमें प्राणोंकी बाजी लगाकर इस निश्चयके साथ शत्रुओंका सामना करता है कि 'या तो मैं मर जाऊँगा या देशकी रक्षा करके ही रहूँगा' उसे भी ब्रह्मा श्रम अर्थात् संन्यास-आश्रमके पालनका ही फल प्राप्त होता है ॥ १६ ॥

अजिह्यमशठं मार्गं वर्तमानस्य भारत । सर्वदा सर्वभूतेषु ब्रह्मा श्रमपदं भवेत् ॥ १७ ॥ भरतनन्दन! जो सदा समस्त प्राणियोंके प्रति माया और कुटिलतासे रहित यथार्थ व्यवहार करता है, उसे भी ब्रह्मा श्रम सेवनका ही फल प्राप्त होता है ॥ १७ ॥

वानप्रस्थेषु विप्रेषु त्रैविद्येषु च भारत । प्रयच्छतोऽर्थात् विपुलान् वन्याश्रमपदं भवेत् ॥ १८ ॥ भारत! जो वानप्रस्थ, ब्राह्मणों तथा तीनों वेदके विद्वानोंको प्रचुर धन दान करता है, उसे वानप्रस्थ-आश्रमके सेवनका फल मिलता है ॥ १८ ॥

सर्वभूतेष्वनुक्रोशं कुर्वतस्तस्य भारत । आनृशंस्यप्रवृत्तस्य सर्वावस्थं पदं भवेत् ॥ १९ ॥ भरतनन्दन! जो समस्त प्राणियोंपर दया करता है और क्रूरतारहित कर्मोंमें ही प्रवृत्त होता है, उसे सभी आश्रमोंके सेवनका फल प्राप्त होता है ॥ १९ ॥

बालवृद्धेषु कौन्तेय सर्वावस्थं युधिष्ठिर । अनुक्रोशक्रिया पार्थ सर्वावस्थं पदं भवेत् ॥ २० ॥ कुन्तीकुमार युधिष्ठिर! जो बालकों और बूढ़ोंके प्रति दयापूर्ण बर्ताव करता है, उसे भी सभी आश्रमोंके सेवनका फल प्राप्त होता है ॥ २० ॥

बलात्कृतेषु भूतेषु परित्राणं कुरूद्वह । शरणागतेषु कौरव्य कुर्वन् गार्हस्थ्यमावसेत् ॥ २१ ॥

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