महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै॥ ३६ ॥ धर्मे स्थिता सत्त्ववीर्या धर्मसेतुवटारका । त्यागवाताध्वगा शीघ्रा नौस्तं संतारयिष्यति ॥ ३७ ॥ राजधर्म एक नौकाके समान है। वह नौका धर्मरूपी समुद्रमें स्थित है। सत्त्वगुण ही उस नौकाका संचालन करनेवाला बल (कर्णधार) है, धर्मशास्त्र ही उसे बाँधनेवाली रस्सी है, त्यागरूपी वायुका सहारा पाकर वह मार्गपर शीघ्रतापूर्वक चलती है, वह नाव ही राजाको संसारसमुद्रसे पार कर देगी॥ ३७ ॥ यदा निवृत्तः सर्वस्मात् कामो योऽस्य हृदि स्थितः । तदा भवति सत्त्वस्थस्ततो ब्रह्म समश्नुते ॥ ३८ ॥ मनुष्यके हृदयमें जो-जो कामनाएँ स्थित हैं, उन सबसे जब वह निवृत्त हो जाता है, तब उसकी विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थिति होती है और इसी समय उसे परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार होता है॥ ३८ ॥ सुप्रसन्नस्तु भावेन योगेन च नराधिप । धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यते पालने रतः ॥ ३९ ॥ नरेश्वर! पुरुषसिंह! चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगसे और समभावसे जब अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध एवं प्रसन्न हो जाता है, तब प्रजापालनपरायण राजा उत्तम धर्मके फलका भागी होता है॥ ३९ ॥ वेदाध्ययनशीलानां विप्राणां साधुकर्मणाम् । पालने यत्नमातिष्ठ सर्वलोकस्य चैव ह ॥ ४० ॥ युधिष्ठिर! तुम वेदाध्ययनमें संलग्न रहनेवाले, सत्कर्मपरायण ब्राह्मणों तथा अन्य सब लोगोंके पालन-पोषणका प्रयत्न करो॥ ४० ॥ वने चरन्ति ये धर्ममाश्रमेषु च भारत । रक्षणात् तच्छतगुणं धर्मं प्राप्नोति पार्थिवः ॥ ४१ ॥ भरतनन्दन! वनमें और विभिन्न आश्रमोंमें रहकर जो लोग जितना धर्म करते हैं, उनकी रक्षा करनेसे राजा उनसे सौगुने धर्मका भागी होता है॥ ४१ ॥ एष ते विविधो धर्मः पाण्डवश्रेष्ठ कीर्तितः । अनुतिष्ठ त्वमेनं वै पूर्वदृष्टं सनातनम् ॥ ४२ ॥ पाण्डवश्रेष्ठ! यह तुम्हारे लिये नाना प्रकारका धर्म बताया गया है। पूर्वजोंद्वारा आचरित इस सनातन-धर्मका तुम पालन करो॥ ४२ ॥ चातुराश्रम्यमैकाग्र्यं चातुर्वर्ण्यं च पाण्डव । धर्मं पुरुषशार्दूल प्राप्स्यसे पालने रतः ॥ ४३ ॥ पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! यदि तुम प्रजाके पालनमें तत्पर रहोगे तो चारों आश्रमोंके, चारों वर्णोंके तथा एकाग्रताके धर्मको प्राप्त कर लोगे॥ ४३ ॥