भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 459

‘प्रजाका सहयोग पाकर आप एक प्रबल, दुर्जय और प्रतापी राजा होंगे। जैसे कुबेर यक्षों तथा राक्षसोंकी रक्षा करके उन्हें सुखी बनाते हैं, उसी प्रकार आप हमें सुरक्षित एवं सुखसे रखेंगे ॥ २६ ॥ यं च धर्मं चरिष्यन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य धर्मस्य त्वत्संस्थं वै भविष्यति ॥ २७ ॥ ‘आप जैसे राजाके द्वारा सुरक्षित हुई प्रजाएँ जो-जो धर्म करेंगी, उसका चतुर्थ भाग आपको मिलता रहेगा ॥ तेन धर्मेण महता सुखं लब्धेन भावितः । पाह्यस्मान् सर्वतो राजन् देवानिव शतक्रतुः ॥ २८ ॥ ‘राजन्! सुखपूर्वक प्राप्त हुए उस महान् धर्मसे सम्पन्न हो आप उसी प्रकार सब ओरसे हमारी रक्षा कीजिये, जैसे इन्द्र देवताओंकी रक्षा करते हैं ॥ २८ ॥ विजयाय हि निर्याहि प्रतपन् रश्मिवानिव । मानं विधम शत्रूणां जयोऽस्तु तव सर्वदा ॥ २९ ॥ ‘महाराज! आप तपते हुए अंशुमाली सूर्यके समान विजयके लिये यात्रा कीजिये, शत्रुओंका घमंड धूलमें मिला दीजिये और सर्वदा आपकी जय हो’ ॥ २९ ॥ स निर्ययौ महातेजा बलेन महता वृतः । महाभिजनसम्पन्नस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ ३० ॥ तब महान् सैन्यबलसे घिरे हुए महाकुलीन, महातेजस्वी राजा मनु अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए-से निकले ॥ ३० ॥ तस्य दृष्ट्वा महत्त्वं ते महेन्द्रस्येव देवताः । अपतत्रसिरे सर्वे स्वधर्मे च ददुर्मनः ॥ ३१ ॥ जैसे देवता देवराज इन्द्रका प्रभाव देखकर प्रभावित हो जाते हैं, उसी प्रकार सब लोग महाराज मनुका महत्त्व देखकर आतंकित हो उठे और अपने-अपने धर्ममें मन लगाने लगे ॥ ३१ ॥ ततो महीं परिययौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् । शमयन् सर्वतः पापान् स्वकर्मसु च योजयन् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वर्षा करनेवाले मेघके समान मनु पापा-चारियोंको शान्त करते और उन्हें अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें लगाते हुए भूमण्डलपर चारों ओर घूमने लगे ॥ एवं ये भूतिमिच्छेयुः पृथिव्यां मानवाः क्वचित् । कुर्यू राजानमेवाग्रे प्रजानुग्रहकारणात् ॥ ३३ ॥ इस प्रकार जो मनुष्य वैभव-वृद्धिकी कामना रखते हों, उन्हें सबसे पहले इस भूमण्डलमें प्रजाजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कोई राजा अवश्य बना लेना चाहिये ॥ ३३ ॥