भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 465

फिरें ॥ २८ ॥ अनयाः सम्प्रवर्तेरन् भवेद् वै वर्णसंकरः । दुर्भिक्षमाविशेद् राष्ट्रं यदि राजा न पालयेत् ॥ २९ ॥ यदि राजा पालन न करे तो सब ओर अन्याय एवं अत्याचार फैल जाय, वर्णसंकर संतानें पैदा होने लगें और समूचे देशमें अकाल पड़ जाय ॥ २९ ॥ विवृत्य हि यथाकामं गृहद्वाराणि शेरते । मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभयाः ॥ ३० ॥ राजासे रक्षित हुए मनुष्य सब ओरसे निर्भय हो जाते हैं और अपनी इच्छाके अनुसार घरके दरवाजे खोलकर सोते हैं ॥ ३० ॥ नाक्रोशं सहते कश्चित् कुतो वा हस्तलाघवम् । यदि राजा न सम्यग् गां रक्षत्यपि धार्मिकः ॥ ३१ ॥ यदि धर्मात्मा राजा भलीभाँति पृथिवीकी रक्षा न करे तो कोई भी मनुष्य गाली-गलौज अथवा हाथसे पीटे जानेका अपमान कैसे सहन करे ॥ ३१ ॥ स्त्रियश्चापुरुषा मार्गं सर्वालङ्कारभूषिताः । निर्भयाः प्रतिपद्यन्ते यदि रक्षति भूमिपः ॥ ३२ ॥ यदि पृथिवीका पालन करनेवाला राजा अपने राज्यकी रक्षा करता है तो समस्त आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दरी स्त्रियाँ किसी पुरुषको साथ लिये बिना भी निर्भय होकर मार्गसे आती-जाती हैं ॥ ३२ ॥ धर्ममेव प्रपद्यन्ते न हिंसन्ति परस्परम् । अनुगृह्णन्ति चान्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३३ ॥ जब राजा रक्षा करता है, तब सब लोग धर्मका ही पालन करते हैं, कोई किसीकी हिंसा नहीं करते और सभी एक-दूसरेपर अनुग्रह रखते हैं ॥ ३३ ॥ यजन्ते च महायज्ञैस्त्रयो वर्णाः पृथग्विधैः । युक्ताश्चाधीयते विद्यां यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३४ ॥ जब राजा रक्षा करता है, तब तीनों वर्णोंके लोग नाना प्रकारके बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं और मनोयोगपूर्वक विद्याध्ययनमें लगे रहते हैं ॥ ३४ ॥ वार्तामूलो ह्ययं लोकस्त्रय्या वै धार्यते सदा । तत् सर्वं वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३५ ॥ खेती आदि समुचित जीविकाकी व्यवस्था ही इस जगत्‌के जीवनका मूल है तथा वृष्टि आदिकी हेतुभूत त्रयी विद्यासे ही सदा जगत्‌का धारण-पोषण होता है। जब राजा प्रजाकी रक्षा करता है, तभी वह सब कुछ ठीक ढंगसे चलता रहता है ॥ ३५ ॥ यदा राजा धुरं श्रेष्ठामादाय वहति प्रजाः । महता बलयोगेन तदा लोकः प्रसीदति ॥ ३६ ॥