महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा मनुष्यको धृष्ट एवं सबल बनाता है और राजा ही उसे दुर्बल कर देता है। राजाके रोषका शिकार बने हुए मनुष्यको कैसे सुख मिल सकता है? राजा अपने शरणागतको सुखी बना देता है॥ ५८॥ (राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं प्रजाश्च राज्ञोऽप्रतिमं शरीरम्। राजा विहीना न भवन्ति देशा देशैर्विहीना न नृपा भवन्ति॥) राजा प्रजाओंका प्रथम अथवा प्रधान शरीर है। प्रजा भी राजाका अनुपम शरीर है। राजाके बिना देश और वहाँके निवासी नहीं रह सकते और देशों तथा देशवासियोंके बिना राजा भी नहीं रह सकते हैं॥ राजा प्रजानां हृदयं गरीयो गतिः प्रतिष्ठा सुखमुत्तमं च। समाश्रिता लोकमिमं परं च जयन्ति सम्यक् पुरुषा नरेन्द्र॥ ५९॥ राजा प्रजाका गुरुतर हृदय, गति, प्रतिष्ठा और उत्तम सुख है। नरेन्द्र! राजाका आश्रय लेनेवाले मनुष्य इस लोक और परलोकपर भी पूर्णतः विजय पा लेते हैं॥ ५९॥ नराधिपश्चाप्यनुशिष्य मेदिनीं दमेन सत्येन च सौहृदेन। महद्भिरिष्ट्वा क्रतुभिर्महायशा- स्त्रिविष्टपे स्थानमुपैति शाश्वतम्॥ ६०॥ राजा भी इन्द्रियसंयम, सत्य और सौहार्दके साथ इस पृथ्वीका भलीभाँति शासन करके बड़े-बड़े यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा महान् यशका भागी हो स्वर्गलोकमें सनातन स्थान प्राप्त कर लेता है॥ ६०॥ स एवमुक्तोऽङ्गिरसा कौसल्यो राजसत्तमः। प्रयत्नात् कृतवान् वीरः प्रजानां परिपालनम्॥ ६१॥ राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ कोसलनरेश वीर वसुमना अपनी प्रजाओंका प्रयत्नपूर्वक पालन करने लगे॥ ६१॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि आङ्गिरसवाक्येऽष्टषष्टितमोऽध्यायः॥ ६८॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें बृहस्पतिजीका उपदेशविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं।)