महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 472, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनगरोपवने चैव पुरोद्यानेषु चैव ह ॥ ६ ॥ कुरुनन्दन! राजाको किलोंमें, राज्यकी सीमापर तथा नगर और गाँवके बगीचोंमें सेना रखनी चाहिये ॥ ६ ॥
संस्थानेषु च सर्वेषु पुरेषु नगरेषु च । मध्ये च नरशार्दूल तथा राजनिवेशने ॥ ७ ॥ नरसिंह! इसी प्रकार सभी पड़ावोंपर, बड़े-बड़े गाँवों और नगरोंमें, अन्तःपुरमें तथा राजमहलके आस-पास भी रक्षक सैनिकोंकी नियुक्ति करनी चाहिये ॥ ७ ॥
प्रणिधींश्च ततः कुर्याज्जडान्धबधिराकृतीन् । पुंसः परीक्षितान् प्राज्ञान् क्षुत्पिपासाश्रमक्षमान् ॥ ८ ॥ तदनन्तर जिन लोगोंकी अच्छी तरह परीक्षा कर ली गयी हो, जो बुद्धिमान् होनेपर भी देखनेमें गूँगे, अंधे और बहरे-से जान पड़ते हों तथा जो भूख-प्यास और परिश्रम सहनेकी शक्ति रखते हों, ऐसे लोगोंको ही गुप्तचर बनाकर आवश्यक कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ॥ ८ ॥
अमात्येषु च सर्वेषु मित्रेषु विविधेषु च । पुत्रेषु च महाराज प्रणिदध्यात् समाहितः ॥ ९ ॥ महाराज! राजा एकाग्रचित्त हो सब मन्त्रियों, नाना प्रकारके मित्रों तथा पुत्रोंपर भी गुप्तचर नियुक्त करे ॥ ९ ॥
पुरे जनपदे चैव तथा सामन्तराजसु । यथा न विद्युरन्योन्यं प्रणिधेयास्तथा हि ते ॥ १० ॥ नगर, जनपद तथा मल्ललोग जहाँ व्यायाम करते हों, उन स्थानोंमें ऐसी युक्तिसे गुप्तचर नियुक्त करने चाहिये, जिससे वे आपसमें भी एक-दूसरेको पहचान न सकें ॥
चारांश्च विद्यात् प्रहितान् परेण भरतर्षभ । आपणेषु विहारेषु समाजेषु च भिक्षुषु ॥ ११ ॥ आरामेषु तथोद्याने पण्डितानां समागमे । देशेषु चत्वरे चैव सभास्वावसथेषु च ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजाको अपने गुप्तचरोंद्वारा बाजारों, लोगोंके घूमने-फिरनेके स्थानों, सामाजिक उत्सवों, भिक्षुकोंके समुदायों, बगीचों, उद्यानों, विद्वानोंकी सभाओं, विभिन्न प्रान्तों, चौराहों, सभाओं और धर्मशालाओंमें शत्रुओंके भेजे हुए गुप्तचरोंका पता लगाते रहना चाहिये ॥ ११-१२ ॥
एवं विचिनुयाद् राजा परचारं विचक्षणः । चारे हि विदिते पूर्वं हितं भवति पाण्डव ॥ १३ ॥ पाण्डुनन्दन! इस प्रकार बुद्धिमान् राजा शत्रुके गुप्तचरका टोह लेता रहे। यदि उसने शत्रुके जासूसका पहले ही पता लगा लिया तो इससे उसका बड़ा हित होता है ॥ १३ ॥