भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 474

चाहिये ॥ १८ ॥ यात्रायां यदि विज्ञातमनाक्रन्दमनन्तरम् । व्यासक्तं च प्रमत्तं च दुर्बलं च विचक्षणः ॥ १९ ॥ यात्रामाज्ञापयेद् वीरः कल्यः पुष्टबलः सुखी । पूर्वं कृत्वा विधानं च यात्रायां नगरे तथा ॥ २० ॥ यदि शत्रुपर चढ़ाई करनेकी इच्छा हो तो पहले उसके बलाबलके बारेमें अच्छी तरह पता लगा लेना चाहिये। यदि वह मित्रहीन, सहायकों और बन्धुओंसे रहित, दूसरोंके साथ युद्धमें लगा हुआ, प्रमादमें पड़ा हुआ तथा दुर्बल जान पड़े और इधर अपनी सैनिक शक्ति प्रबल हो तो युद्धनिपुण, सुखके साधनोंसे सम्पन्न एवं वीर राजाको उचित है कि अपनी सेनाको यात्राके लिये आज्ञा दे दे। पहले अपनी राजधानीकी रक्षाका प्रबन्ध करके शत्रुपर आक्रमण करना चाहिये ॥ १९-२० ॥ न च वश्यो भवेदस्य नृपो यश्चातिवीर्यवान् । हीनश्च बलवीर्याभ्यां कर्षयंस्तत्परो वसेत् ॥ २१ ॥ बल और पराक्रमसे हीन राजा भी जो अपनेसे अत्यन्त शक्तिशाली नरेश हो उसके अधीन न रहे। उसे चाहिये कि गुप्तरूपसे प्रबल शत्रुको क्षीण करनेका प्रयत्न करता रहे ॥ २१ ॥ राष्ट्रं च पीडयेत् तस्य शस्त्राग्निविषमूर्च्छनैः । अमात्यवल्लभानां च विवादांस्तस्य कारयेत् ॥ २२ ॥ वह शस्त्रोंके प्रहारसे घायल करके, आग लगाकर तथा विषके प्रयोगद्वारा मूर्च्छित करके शत्रुके राष्ट्रमें रहनेवाले लोगोंको पीड़ा दे। मन्त्रियों तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंमें कलह प्रारम्भ करा दे ॥ २२ ॥ वर्जनीयं सदा युद्धं राज्यकामेन धीमता । उपायैस्त्रिभिरादानमर्थस्याह बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ सान्त्वेन तु प्रदानेन भेदेन च नराधिप । यदर्थं शक्नुयात् प्राप्तुं तेन तुष्येत पण्डितः ॥ २४ ॥ जो बुद्धिमान् राजा राज्यका हित चाहे, उसे सदा युद्धको टालनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। नरेश्वर! बृहस्पतिजीने साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे ही राजाके लिये धनकी आय बतायी है। इन उपायोंसे जो धन प्राप्त किया जा सके, उसीसे विद्वान् राजाको संतुष्ट होना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ आददीत बलिं चापि प्रजाभ्यः कुरुनन्दन । स षड्भागमपि प्राज्ञस्तासामेवाभिगुप्तये ॥ २५ ॥ कुरुनन्दन! बुद्धिमान् नरेश प्रजाजनोंसे उन्हींकी रक्षाके लिये उनकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करे ॥ २५ ॥