महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 477, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्तमान अथवा भविष्यमें सदा किसी मित्रका कार्य उपस्थित हो तो उसे भी छोड़कर अपने शत्रुके उस शत्रुका आश्रय लेकर रहे जो राज्यकी भूमिके निकट का निवासी हो तथा युद्धमें शत्रुपर आघात करनेके लिये तैयार रहता हो ॥ ४० ॥
दुर्गाणां चाभितो राजा मूलच्छेदं प्रकारयेत् ।
सर्वेषां क्षुद्रवृक्षाणां चैत्यवृक्षान् विवर्जयेत् ॥ ४१ ॥
जो छोटे-छोटे दुर्ग हों (जिनमें शत्रुओंके छिपनेकी सम्भावना हो), उन सबका राजा मूलोच्छेद करा डाले और चैत्य (देवालय सम्बन्धी) वृक्षोंको छोड़कर अन्य सभी छोटे-छोटे वृक्षोंको कटवा दे ॥ ४१ ॥
प्रवृद्धानां च वृक्षाणां शाखां प्रच्छेदयेत् तथा ।
चैत्यानां सर्वथा त्याज्यमपि पत्रस्य पातनम् ॥ ४२ ॥
जो वृक्ष बढ़कर बहुत फैल गये हों, उनकी डालियाँ कटवा दे; परंतु देवसम्बन्धी वृक्षोंको सर्वथा सुरक्षित रहने दे। उनका एक पत्ता भी न गिरावे ॥ ४२ ॥
प्रगण्डीः कारयेत् सम्यगाकाशजननीस्तदा ।
आपूरयेच्च परिखां स्थाणुनक्रझषाकुलाम् ॥ ४३ ॥
नगर एवं दुर्गके परकोटोंपर शूरवीर रक्षा-सैनिकोंके बैठनेके लिये स्थान बनावे, ऐसे स्थानोंको 'प्रगण्डी' कहते हैं, इन्हीं प्रगण्डियोंकी एक पाखवाली दीवारोंमें बाहरकी वस्तुओंको देखनेके लिये छोटे-छोटे छिद्र बनवावे, इन छिद्रोंको 'आकाशजननी' कहते हैं (इनके द्वारा तोपोंसे गोलियाँ छोड़ी जाती हैं), इन सबका अच्छी तरहसे निर्माण करावे। परकोटोंके बाहर बनी हुई खाईमें जल भरवा दे और उसमें त्रिशूलयुक्त खंभे गड़वा दे तथा मगरमच्छ और बड़े-बड़े मत्स्य भी डलवा दे ॥ ४३ ॥
संकटद्वारकाणि स्युरुच्छ्वासार्थं पुरस्य च ।
तेषां च द्वारवद् गुप्तिः कार्या सर्वात्मना भवेत् ॥ ४४ ॥
नगरमें हवा आने-जानेके लिये परकोटोंमें सँकरे दरवाजे बनावे और बड़े दरवाजोंकी भाँति उनकी भी सब प्रकारसे रक्षा करे ॥ ४४ ॥
द्वारेषु च गुरूण्येव यन्त्राणि स्थापयेत् सदा ।
आरोपयेच्छतघ्नीश्च स्वाधीनानि च कारयेत् ॥ ४५ ॥
सभी दरवाजोंपर भारी-भारी यन्त्र और तोप सदा लगाये रखे और उन सबको अपने अधिकारमें रखे ॥ ४५ ॥
काष्ठानि चाभिहार्याणि तथा कूपांश्च खानयेत् ।
संशोधयेत् तथा कूपान् कृतपूर्वान् पयोऽर्थिभिः ॥ ४६ ॥
किलेके भीतर बहुत-सा ईंधन इकट्ठा कर ले और कुएँ खुदवाये। जल पीनेकी इच्छावाले लोगोंने पहले जो कुएँ बना रखे हों, उनको भी झरवाकर शुद्ध करा दे ॥
तृणच्छन्नानि वेश्मानि पङ्केनाथ प्रलेपयेत् ।