भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 479

परिखाश्चैव कौरव्य प्रतोलीर्निष्कुटानि च । न जात्वन्यः प्रपश्येत गुह्यमेतद् युधिष्ठिर ॥ ५५ ॥ कुरूनन्दन युधिष्ठिर! अन्नके भण्डार, शस्त्रागार, योद्धाओंके निवासस्थान, अश्वशालाएँ, गजशालाएँ, सैनिक शिविर, खाई, गलियाँ तथा राजमहलके उद्यान—इन सब स्थानोंको गुप्तरीतिसे बनवाना चाहिये, जिससे कभी दूसरा कोई देख न सके ॥ ५४-५५ ॥ अर्थसंनिचयं कुर्याद् राजा परबलार्दितः । तैलं वसा मधु घृतमौषधानि च सर्वशः ॥ ५६ ॥ अङ्गारकुशमुञ्जानां पलाशशरवर्णिनाम् । यवसेन्धनदिग्धानां कार्यीत च संचयान् ॥ ५७ ॥ शत्रुओंकी सेनासे पीड़ित हुआ राजा धन-संचय तथा आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करके रखे। घायलोंकी चिकित्साके लिये तेल, चर्बी, मधु, घी, सब प्रकारके औषध, अङ्गारे, कुश, मूँज, ढाक, बाण, लेखक, घास और विषमें बुझाये हुए बाणोंका भी संग्रह करावे ॥ ५६-५७ ॥ आयुधानां च सर्वेषां शक्त्यृष्टिप्रासवर्मणाम् । संचयानेवमादीनां कार्यीत नराधिपः ॥ ५८ ॥ इसी प्रकार राजाको चाहिये कि शक्ति, ऋष्टि और प्रास आदि सब प्रकारके आयुधों, कवचों तथा ऐसी ही अन्य आवश्यक वस्तुओंका संग्रह करावे ॥ ५८ ॥ औषधानि च सर्वाणि मूलानि च फलानि च । चतुर्विधांश्च वैद्यान् वै संगृह्णीयाद् विशेषतः ॥ ५९ ॥ सब प्रकारके औषध, मूल, फूल तथा विषका नाश करनेवाले, घावपर पट्टी करनेवाले, रोगोंको निवारण करनेवाले और कृत्याका नाश करनेवाले—इन चार प्रकारके वैद्योंका विशेष रूपसे संग्रह करे ॥ ५९ ॥ नटांश्च नर्तकांश्चैव मल्लान् मायाविनस्तथा । शोभयेयुः पुरवरं मोदयेयुश्च सर्वशः ॥ ६० ॥ साधारण स्थितिमें राजाको नटों, नर्तकों, पहलवानों तथा इन्द्रजाल दिखानेवालोंको भी अपने यहाँ आश्रय देना चाहिये; क्योंकि ये राजधानीकी शोभा बढ़ाते हैं और सबको अपने खेलोंसे आनन्द प्रदान करते हैं ॥ ६० ॥ यतः शङ्का भवेच्चापि भृत्यतोऽथापि मन्त्रितः । पौरेभ्यो नृपतेर्वापि स्वाधीनान् कारयीत तान् ॥ ६१ ॥ यदि राजाको अपने किसी नौकरसे, मन्त्रीसे, पुरवासियोंसे अथवा किसी पड़ोसी राजासे भी कोई संदेह हो जाय तो समयोचित उपायोंद्वारा उन सबको अपने वशमें कर ले ॥ ६१ ॥ कृते कर्मणि राजेन्द्र पूजयेद् धनसंचयैः ।

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