भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

साथ ही उसने प्रसन्नतापूर्वक कर्णको अंगदेशकी मालिनी नगरी दे दी। नरश्रेष्ठ! शत्रुविजयी कर्ण तभीसे अंगदेशका राजा हो गया था। इसके बाद दुर्योधनकी अनुमतिसे शत्रु-सैन्यसंहारी कर्ण चम्पा नगरी—चम्पारनका भी पालन करने लगा। यह सब तो तुम्हें भी ज्ञात ही है॥

एवं शस्त्रप्रतापेन प्रथितः सोऽभवत् क्षितौ । त्वद्धितार्थं सुरेन्द्रेण भिक्षितो वर्मकुण्डले ॥ ८ ॥

इस प्रकार कर्ण अपने शस्त्रोंके प्रतापसे समस्त भूमण्डलमें विख्यात हो गया। एक दिन देवराज इन्द्रने तुमलोगोंके हितके लिये कर्णसे उसके कवच और कुण्डल माँगे ॥ ८ ॥

स दिव्ये सहजे प्रादात् कुण्डले परमार्जिते । सहजं कवचं चापि मोहितो देवमायया ॥ ९ ॥

देवमायासे मोहित हुए कर्णने अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए दोनों दिव्य कुण्डलों और कवचको भी इन्द्रके हाथमें दे दिया ॥ ९ ॥

विमुक्तः कुण्डलाभ्यां च सहजेन च वर्मणा । निहतो विजयेनाजौ वासुदेवस्य पश्यतः ॥ १० ॥

इस प्रकार जन्मके साथ ही उत्पन्न हुए कवच और कुण्डलोंसे हीन हो जानेपर कर्णको अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते मारा था ॥ १० ॥

ब्राह्मणस्याभिशापेन रामस्य च महात्मनः । कुन्त्याश्च वरदानेन मायया च शतक्रतोः ॥ ११ ॥ भीष्मावमानात् संख्यायां रथस्यार्धानुकीर्तनात् । शल्यात् तेजोवधाच्चापि वासुदेवनयेन च ॥ १२ ॥

एक तो उसे अग्निहोत्री ब्राह्मण तथा महात्मा परशुरामजीके शाप मिले थे। दूसरे, उसने स्वयं भी कुन्तीको अन्य चार भाइयोंकी रक्षाके लिये वरदान दिया था। तीसरे, इन्द्रने माया करके उसके कवच-कुण्डल ले लिये। चौथे, महारथियोंकी गणना करते समय भीष्मजीने अपमानपूर्वक उसे बार-बार अर्धरथी कहा था। पाँचवें, शल्यकी ओरसे उसके तेजको नष्ट करनेका प्रयास किया गया था और छठे, भगवान् श्रीकृष्णकी नीति भी कर्णके प्रतिकूल काम कर रही थी—इन सब कारणोंसे वह पराजित हुआ ॥ ११-१२ ॥

रुद्रस्य देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च । कुबेरद्रोणयोश्चैव कृपस्य च महात्मनः ॥ १३ ॥ अस्त्राणि दिव्यान्यादाय युधि गाण्डीवधन्वना । हतो वैकर्तनः कर्णो दिवाकरसमद्युतिः ॥ १४ ॥