महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभरतनन्दन! राजाको चाहिये कि वह सरल स्वभावसे सम्पन्न हो, धैर्य तथा बुद्धिके बलसे सत्यको ही ग्रहण करे और काम-क्रोधका परित्याग कर दे ।। ६ ।।
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति । न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिशः ।। ७ ।। जो राजा काम और क्रोधका आश्रय लेकर धन पैदा करना चाहता है, वह मूर्ख न तो धर्मको पाता है और न धन ही उसके हाथ लगता है ।। ७ ।।
मा स्म लुब्धांश्च मूर्खांश्च कामार्थे च प्रयुयुजः । अलुब्धान् बुद्धिसम्पन्नान् सर्वकर्मसु योजयेत् ।। ८ ।। तुम लोभी और मूर्ख मनुष्योंको काम और अर्थके साधनमें न लगाओ। जो लोभरहित और बुद्धिमान् हों, उन्हींको समस्त कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ।। ८ ।।
मूर्खो ह्यधिकृतोऽर्थेषु कार्याणामविशारदः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन कामक्रोधसमन्वितः ।। ९ ।। जो कार्यसाधनमें कुशल नहीं है और काम तथा क्रोधके वशमें पड़ा हुआ है, ऐसे मूर्ख मनुष्यको यदि अर्थसंग्रहका अधिकारी बना दिया जाय तो वह अनुचित उपायसे प्रजाओंको क्लेश पहुँचाता है ।। ९ ।।
बलिषष्ठेन शुक्लेन दण्डेनाथापराधिनाम् । शास्त्रानीतेन लिप्सेथा वेतनेन धनागमम् ।। १० ।। प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करके; उचित शुल्क या टैक्स लेकर, अपराधियोंको आर्थिक दण्ड देकर तथा शास्त्रके अनुसार व्यापारियोंकी रक्षा आदि करनेके कारण उनके दिये हुए वेतन लेकर इन्हीं उपायों तथा मार्गोंसे राजाको धन-संग्रहकी इच्छा रखनी चाहिये ।। १० ।।
दापयित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नीत्या यथाविधि । तथैतं कल्पयेद् राजा योगक्षेममतन्द्रितः ।। ११ ।। प्रजासे धर्मानुकूल कर ग्रहण करके राज्यका नीतिके अनुसार विधिपूर्वक पालन करते हुए राजाको आलस्य छोड़कर प्रजावर्गके योगक्षेमकी व्यवस्था करनी चाहिये ।। ११ ।।
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम् । अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः ।। १२ ।। जो राजा आलस्य छोड़कर रण-द्वेषसे रहित हो सदा प्रजाकी रक्षा करता है, दान देता है तथा निरन्तर धर्म एवं न्यायमें तत्पर रहता है, उसके प्रति प्रजावर्गके सभी लोग अनुरक्त होते हैं ।। १२ ।।
मा स्माधर्मेण लोभेन लिप्सेथास्त्वं धनागमम् । धर्मार्थावध्रुवौ तस्य यो न शास्त्रपरो भवेत् ।। १३ ।।