भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 505

ततो भयं विद्यते क्षत्रियस्य ॥ १६ ॥ जब पापात्मा मनुष्य किसी स्त्री अथवा ब्राह्मणकी हत्या करके लोगोंकी सभामें साधुवाद या प्रशंसा पाता है तथा राजाके निकट भी पापसे भय नहीं मानता, उस समय क्षत्रिय राजाके लिये बड़ा भारी भय उपस्थित होता है ॥ १६ ॥

पापैः पापे क्रियमाणे हि चैव ततो रुद्रो जायते देव एषः । पापैः पापाः संजनयन्ति रुद्रं ततः सर्वान् साध्वसाधून् हिनस्ति ॥ १७ ॥ इलानन्दन! जब बहुत-से पापी पापाचार करने लगते हैं, तब ये संहारकारी रुद्रदेव प्रकट हो जाते हैं। पापात्मा पुरुष अपने पापोंद्वारा ही रुद्रको प्रकट करते हैं; फिर वे रुद्रदेव साधु और असाधु सब लोगोंका संहार कर डालते हैं ॥ १७ ॥

ऐल उवाच

कुतो रुद्रः कीदृशो वापि रुद्रः सत्त्वैः सत्त्वं दृश्यते वध्यमानम् । एतत् सर्वं कश्यप मे प्रचक्ष्व कुतो रुद्रो जायते देव एषः ॥ १८ ॥ पुरूरवाने पूछा—कश्यपजी! ये रुद्रदेव कहाँसे आते हैं और कैसे हैं? इस जगत्में तो प्राणियोंद्वारा ही प्राणियोंका वध होता देखा जाता है; फिर ये रुद्रदेव किससे उत्पन्न होते हैं? ये सब बातें मुझे बताइये ॥ १८ ॥

कश्यप उवाच

आत्मा रुद्रो हृदये मानवानां स्वं स्वं देहं परदेहं च हन्ति । वातोत्पातैः सदृशं रुद्रमाहु- र्देवैर्जीमूतैः सदृशं रूपमस्य ॥ १९ ॥ कश्यपने कहा—राजन्! ये रुद्रदेव मनुष्योंके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं और समय आनेपर अपने तथा दूसरेके शरीरोंका नाश करते हैं। विद्वान् पुरुष रुद्रको उत्पात-वायु (तूफानी हवा) के समान वेगवान् कहते हैं और उनका रूप बादलोंके समान बताते हैं ॥ १९ ॥

ऐल उवाच

न वै वातः परिवृणोति कश्चि- न्न जीमूतो वर्षति नापि देवः ।