भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 512

‘ब्राह्मणोंमें सदा तप और मन्त्रका बल उपस्थित होता है और क्षत्रियोंमें अस्त्र तथा भुजाओंका ।। १४ ।।
ताभ्यां सम्भूय कर्तव्यं प्रजानां परिपालनम् ।
तथा च मां प्रवर्तन्तं किं गर्हस्यलकाधिप ।। १५ ।।
‘अलकापते! अतः ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको एक साथ मिलकर ही प्रजाका पालन करना चाहिये। मैं भी इसी नीतिके अनुसार कार्य कर रहा हूँ; फिर आप मेरी निन्दा क्यों करते हैं? ।। १५ ।।
ततोऽब्रवीद् वैश्रवणो राजानं सपुरोहितम् ।
नाहं राज्यमनिर्दिष्टं कस्मैचिद् विदधाम्युत ।। १६ ।।
नाच्छिन्दे चाप्यनिर्दिष्टमिति जानीहि पार्थिव ।
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां मद्दत्तामखिलामिमाम् ।
एवमुक्तः प्रत्युवाच मुचुकुन्दो महीपतिः ।। १७ ।।
तब कुबेरने पुरोहितसहित राजा मुचुकुन्दसे कहा—‘पृथ्वीपते! मैं ईश्वरकी आज्ञाके बिना न तो किसीको राज्य देता हूँ और न भगवान्‌की अनुमतिके बिना दूसरेका राज्य छीनता ही हूँ। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। यद्यपि ऐसी ही बात है तो भी आज मैं तुम्हें इस सारी पृथ्वीका राज्य दे रहा हूँ। तुम मेरी दी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करो’। उनके ऐसा कहनेपर राजा मुचुकुन्दने इस प्रकार उत्तर दिया ।। १६-१७ ।।

मुचुकुन्द उवाच
नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव ।
बाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीयामिति कामये ।। १८ ।।
मुचुकुन्द बोले—राजाधिराज! मैं आपके दिये हुए राज्यको नहीं भोगना चाहता। मेरी तो यही इच्छा है कि मैं अपने बाहुबलसे उपार्जित राज्यका उपभोग करूँ ।। १८ ।।

भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणो राजा विस्मयं परमं ययौ ।
क्षत्रधर्मे स्थितं दृष्ट्वा मुचुकुन्दमसम्भ्रमम् ।। १९ ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! राजा मुचुकुन्दको बिना किसी घबराहटके इस प्रकार क्षत्रियधर्ममें स्थित हुआ देख कुबेरको बड़ा विस्मय हुआ ।। १९ ।।
ततो राजा मुचुकुन्दः सोऽन्वशासद् वसुन्धराम् ।
बाहुवीर्यार्जितां सम्यक्क्षत्रधर्ममनुव्रतः ।। २० ।।
तदनन्तर क्षत्रियधर्मका ठीक-ठीक पालन करनेवाले राजा मुचुकुन्दने अपने बाहुबलसे प्राप्त की हुई इस वसुधाका शासन किया ।। २० ।।
एवं यो धर्मविद् राजा ब्रह्मपूर्वं प्रवर्तते ।