महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 521, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवें महापथिक (दूर देशके यात्री या समुद्र—यात्रा करनेवाले) ब्राह्मण चाण्डालके तुल्य माने जाते हैं ।। ६ ।।
(म्लेच्छदेशास्तु ये केचित् पापैरेध्युषिता नरैः ।
गत्वा तु ब्राह्मणस्तांश्च चाण्डालः प्रेत्य चेह च ।।
जो कोई म्लेच्छ देश हैं और जहाँ पापी मनुष्य निवास करते हैं, वहाँ जाकर ब्राह्मण इहलोकमें चाण्डालके तुल्य हो जाता है, और मृत्युके बाद अधोगतिको प्राप्त होता है ।।
व्रात्यान् म्लेच्छांश्च शूद्रांश्च याजयित्वा द्विजाधमः ।
अकीर्तिमिह सम्प्राप्य नरकं प्रतिपद्यते ।।
संस्कारभ्रष्ट, म्लेच्छ तथा शूद्रोंका यज्ञ कराकर पतित हुआ अधम ब्राह्मण इस संसारमें अपयश पाता और मरनेके बाद नरकमें गिरता है ।।
ब्राह्मणो ऋग्यजुःसाम्नां मूढः कृत्वा तु विप्लवम् ।
कल्पमेकं कृमिःसोऽथ नानाविष्ठासु जायते ।।)
जो मूर्ख ब्राह्मण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंका विप्लव करता है, वह एक कल्पतक नाना प्राणियोंकी विष्ठाओंका कीड़ा होता है ।।
ऋत्विक् पुरोहितो मन्त्री दूतो वार्तानुकर्षकः ।
एते क्षत्रसमा राजन् ब्राह्मणानां भवन्त्युत ।। ७ ।।
राजन्! ब्राह्मणोंमेंसे जो ऋत्विज्, राजपुरोहित, मन्त्री, राजदूत अथवा संदेशवाहक हों, वे क्षत्रियके समान माने जाते हैं ।। ७ ।।
अश्वारोहा गजारोहा रथिनोऽथ पदातयः ।
एते वैश्यसमा राजन् ब्राह्मणानां भवन्त्युत ।। ८ ।।
नरेश्वर! घुड़सवार, हाथीसवार, रथी और पैदल सिपाहीका काम करनेवाले ब्राह्मणोंको वैश्यके समान समझा जाता है ।। ८ ।।
एतेभ्यो बलिमादद्याद्धीनकोशो महीपतिः ।
ऋते ब्रह्मसमेभ्यश्च देवकल्पेभ्य एव च ।। ९ ।।
यदि राजाके खजानेमें कमी हो तो वह इन ब्राह्मणोंसे कर ले सकता है। केवल उन ब्राह्मणोंसे, जो ब्रह्माजी तथा देवताओंके समान बताये गये हैं, कर नहीं लेना चाहिये ।।
अब्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् ।
ब्राह्मणानां च ये केचिद् विकर्मस्था भवन्त्युत ।। १० ।।
राजा ब्राह्मणके सिवा अन्य सब वर्णोंके धनका स्वामी होता है, यही वैदिक सिद्धान्त है। ब्राह्मणोंमेंसे जो कोई अपने वर्णके विपरीत कर्म करनेवाले हैं, उनके धनपर भी राजाका ही अधिकार है ।। १० ।।
विकर्मस्थाश्च नोपेक्ष्या विप्रा राज्ञा कथंचन ।
नियम्याः संविभज्याश्च धर्मानुग्रहकारणात् ।। ११ ।।