महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। जिसमें राक्षसके द्वारा अपहृत होते समय केकयराजके प्रकट किये हुए उद्गारका वर्णन है ।। ६ ।।
केकयानामधिपतिं रक्षो जग्राह दारुणम् ।
स्वाध्यायेनान्वितं राजन्नरण्ये संशितव्रतम् ।। ७ ।।
राजन्! एक समयकी बात है, केकयराज वनमें रहकर कठोर व्रतका पालन (तप) और स्वाध्याय किया करते थे। एक दिन उन्हें एक भयंकर राक्षसने पकड़ लिया ।। ७ ।।
राजोवाच
न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः ।
नानाहिताग्निर्नायज्वा मामकान्तरमाविशः ।। ८ ।।
यह देख राजाने उस राक्षससे कहा—मेरे राज्यमें एक भी चोर, कंजूस, शराबी अथवा अग्निहोत्र और यज्ञका त्याग करनेवाला नहीं है तो भी तुम्हारा मेरे शरीरमें प्रवेश कैसे हो गया? ।। ८ ।।
न च मे ब्राह्मणोऽविद्वान्नाव्रती नाप्यसोमपः ।
नानाहिताग्निर्नायज्वा मामकान्तरमाविशः ।। ९ ।।
मेरे राज्यमें एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं है जो विद्वान्, उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, यज्ञमें सोमरस पीनेवाला, अग्निहोत्री और यज्ञकर्ता न हो तो भी तुमने मेरे भीतर कैसे प्रवेश किया? ।। ९ ।।
नानाप्रदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते विषये मम ।
नाधीते नाव्रती कश्चिन्मामकान्तरमाविशः ।। १० ।।
मेरे राज्यमें समस्त द्विज नाना प्रकारकी उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किये बिना वेदोंका अध्ययन नहीं करता। फिर भी मेरे शरीरके भीतर तुम्हारा प्रवेश कैसे हुआ? ।। १० ।।
अधीयतेऽध्यापयन्ति यजन्ते याजयन्ति च ।
ददति प्रतिगृह्णन्ति षट्सु कर्मस्ववस्थिताः ।। ११ ।।
मेरे राज्यके ब्राह्मण पढ़ते-पढ़ाते, यज्ञ करते-कराते, दान देते और लेते हैं। इस प्रकार वे ब्राह्मणोचित छः कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं ।। ११ ।।
पूजिताः संविभक्ताश्च मृदवः सत्यवादिनः ।
ब्राह्मणा मे स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ।। १२ ।।
मेरे राज्यके सभी ब्राह्मण अपने-अपने कर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं। कोमल स्वभाववाले तथा सत्यवादी हैं। उन सबको मेरे राज्यसे वृत्ति मिलती है, तथा वे मेरे द्वारा पूजित होते रहते हैं तो भी तुम्हारा मेरे शरीरके भीतर प्रवेश कैसे सम्भव हुआ? ।। १२ ।।
न याचन्ते प्रयच्छन्ति सत्यधर्मविशारदाः ।