भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 526

संविभक्ताश्च सत्कृत्य मामकान्तरमाविशः ॥ २० ॥
अपने राज्यके तपस्वी मुनियोंकी मैंने सदा ही पूजा और रक्षा की है तथा उन्हें सत्कारपूर्वक आवश्यक वस्तुएँ दी हैं। इतनेपर भी मेरे शरीरके भीतर तुम्हारा प्रवेश कैसे सम्भव हुआ है? ॥ २० ॥
नासंविभज्य भोक्तास्मि नाविशामि परस्त्रियम् ।
स्वतन्त्रो जातु न क्रीडे मामकान्तरमाविशः ॥ २१ ॥
मैं देवता, पितर तथा अतिथि आदिको उनका भाग अर्पण किये बिना कभी नहीं भोजन करता। परायी स्त्रीसे कभी सम्पर्क नहीं रखता तथा कभी स्वच्छन्द होकर क्रीडा नहीं करता तो भी तुमने मेरे शरीरमें कैसे प्रवेश किया? ॥
नाब्रह्मचारी भिक्षावान्भिक्षुर्वाऽब्रह्मचर्यवान् ।
अनृत्विजा हुतं नास्ति मामकान्तरमाविशः ॥ २२ ॥
मेरे राज्यमें कोई भी ब्रह्मचर्यका पालन न करनेवाला भिक्षा नहीं माँगता अथवा भिक्षु या संन्यासी ब्रह्मचर्यका पालन किये बिना नहीं रहता। बिना ऋत्विज्‌के मेरे यहाँ होम नहीं होता; फिर तुम कैसे मेरे भीतर घुस आये? ॥
(कृतं राज्यं मया सर्वं राज्यस्थेनापि कार्यवत् ।
नाहं व्युत्क्रमितः सत्यान्मामकान्तरमाविशः ॥)
राज्यसिंहासनपर स्थित होकर भी मैंने सारा राज्यकार्य कर्तव्य-पालनकी दृष्टिसे किया है और कभी सत्यसे मैं विचलित नहीं हुआ हूँ; तो भी मेरे शरीरके भीतर तुम्हारा प्रवेश कैसे हुआ है? ॥
नावजानाम्यहं वैद्यान्न वृद्धान्न तपस्विनः ।
राष्ट्रे स्वपति जागर्मि मामकान्तरमाविशः ॥ २३ ॥
मैं विद्वानों, वृद्धों तथा तपस्वी जनोंका कभी तिरस्कार नहीं करता हूँ। जब सारा राष्ट्र सोता है, उस समय भी मैं उसकी रक्षाके लिये जागता रहता हूँ, तथापि तुम मेरे शरीरके भीतर कैसे चल आये? ॥ २३ ॥
(शुक्लकर्मास्मि सर्वत्र न दुर्गतिभयं मम ।
धर्मचारी गृहस्थश्च मामकान्तरमाविशः ॥)
आत्मविज्ञानसम्पन्नस्तपस्वी सर्वधर्मवित् ।
स्वामी सर्वस्य राष्ट्रस्य धीमान् मम पुरोहितः ॥ २४ ॥
मैं सब जगह निर्दोष एवं विशुद्ध कर्म करनेवाला हूँ, मुझे कहीं भी दुर्गतिका भय नहीं है। मैं धर्मका आचरण करनेवाला गृहस्थ हूँ। तुम मेरे शरीरके भीतर कैसे आ गये? मेरे बुद्धिमान् पुरोहित आत्मज्ञानी, तपस्वी तथा सब धर्मोंके ज्ञाता हैं। वे सम्पूर्ण राष्ट्रके स्वामी हैं ॥ २४ ॥
दानेन विद्यामभिवाञ् छयामि