भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 55

सदैव निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा मायोपजीवनः । मिथ्याविनीतः सततमस्मास्वनपकारिषु ॥ २३ ॥ हमलोगोंने कभी कोई बुराई नहीं की थी तो भी राजा धृतराष्ट्र सदा हमसे द्वेष रखते थे। उनकी बुद्धि निरन्तर हमें ठगनेकी ही बात सोचा करती थी। वे मायाका आश्रय लेनेवाले थे और झूठे ही विनय अथवा नम्रता दिखाया करते थे ॥ २३ ॥

न सकामा वयं ते च न चास्माभिर्न तैर्जितम् । न तैर्भुक्तेयमवनिर्न नार्यो गीतवादितम् ॥ २४ ॥ इस युद्धसे न तो हमारी कामना सफल हुई और न वे कौरव ही सफलमनोरथ हुए। न हमारी जीत हुई, न उनकी। उन्होंने न तो इस पृथ्वीका उपभोग किया, न स्त्रियोंका सुख देखा और न गीतवाद्यका ही आनन्द लिया ॥ २४ ॥

नामात्यसुहृदां वाक्यं न च श्रुतवतां श्रुतम् । न रत्नानि परार्घ्यानि न भूर्न द्रविणागमः ॥ २५ ॥ मन्त्रियों, सुहृदों तथा वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता विद्वानोंकी भी बातें वे नहीं सुन सके। बहुमूल्य रत्न, पृथ्वीके राज्य तथा धनकी आयका भी सुख भोगनेका उन्हें अवसर नहीं मिला ॥ २५ ॥

अस्मद्वेषेण संतप्तः सुखं न स्मेह विन्दति । ऋद्धिमस्मासु तां दृष्ट्वा विवर्णो हरिणः कृशः ॥ २६ ॥ दुर्योधन हमसे द्वेष रखनेके कारण सदा संतप्त रहकर कभी यहाँ सुख नहीं पाता था। हमलोगोंके पास वैसी समृद्धि देखकर उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वह चिन्तासे सूखकर पीला और दुर्बल हो गया था ॥

धृतराष्ट्रश्च नृपतिः सौबलेन निवेदितः । तं पिता पुत्रगृद्धित्वादनुमेनेऽनये स्थितः ॥ २७ ॥ अनपेक्ष्यैव पितरं गाङ्गेयं विदुरं तथा । सुबलपुत्र शकुनिने राजा धृतराष्ट्रको दुर्योधनकी यह अवस्था सूचित की। पुत्रके प्रति अधिक आसक्त होनेके कारण पिता धृतराष्ट्रने अन्यायमें स्थित हो उसकी इच्छाका अनुमोदन किया। इस विषयमें उन्होंने अपने पिता (ताऊ) गंगानन्दन भीष्म तथा भाई विदुरसे राय लेनेकी भी इच्छा नहीं की ॥ २७ १/२ ॥

असंशयं क्षयं राजा यथैवाहं तथा गतः ॥ २८ ॥ उनकी इसी दुर्नीतिके कारण निःसंदेह राजा धृतराष्ट्रको भी वैसा ही विनाश प्राप्त हुआ है, जैसा कि मुझे ॥ २८ ॥

अनियम्याशुचिं लुब्धं पुत्रं कामवशानुगम् । यशसः पतितो दीप्ताद् घातयित्वा सहोदरान् ॥ २९ ॥