महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण! अक्रूर और उग्रसेनके अधिकारमें गये हुए राज्यको भाई-बन्धुओंमें फूट पड़नेके भयसे अन्यकी तो कौन कहे इतने शक्तिशाली होकर स्वयं भी आप किसी तरह वापस नहीं ले सकते ।। १७ ।। तच्च सिध्येत् प्रयत्नेन कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । महाक्षयं व्ययो वा स्याद् विनाशो वा पुनर्भवेत् ।। १८ ।। बड़े प्रयत्नसे अत्यन्त दुष्कर कर्म महान् संहाररूप युद्ध करनेपर राज्यको वापस लेनेका कार्य सिद्ध हो सकता है, परंतु इसमें धनका बहुत व्यय और असंख्य मनुष्योंका पुनः विनाश होगा ।। १८ ।। अनायसेन शस्त्रेण मृदुना हृदयच्छिदा । जिह्वामुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानुमृज्य च ।। १९ ।। अतः श्रीकृष्ण! आप एक ऐसे कोमल शस्त्रसे, जो लोहेका बना हुआ न होनेपर भी हृदयको छेद डालनेमें समर्थ है, परिमार्जन³ और अनुमार्जन³ करके उन सबकी जीभ उखाड़ लें—उन्हें मूक बना दें (जिससे फिर कलहका आरम्भ न हो) ।। १९ ।।
वासुदेव उवाच
अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् । येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ।। २० ।। **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**मुने! बिना लोहेके बने हुए उस कोमल शस्त्रको मैं कैसे जानूँ, जिसके द्वारा परिमार्जन और अनुमार्जन करके इन सबकी जिह्वाको उखाड़ लूँ ।। २० ।।
नारद उवाच
शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षार्जवमार्दवम् । यथार्हप्रतिपूजा च शस्त्रमेतदनायसम् ।। २१ ।। **नारदजीने कहा—**श्रीकृष्ण! अपनी शक्तिके अनुसार सदा अन्नदान करना, सहनशीलता, सरलता, कोमलता तथा यथायोग्य पूजन (आदर-सत्कार) करना—यही बिना लोहेका बना हुआ शस्त्र है ।। २१ ।। ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटुकानि लघूनि च । गिरा त्वं हृदयं वाचं शमयस्व मनांसि च ।। २२ ।। जब सजातीय बन्धु आपके प्रति कड़वी तथा ओछी बातें कहना चाहें, उस समय आप मधुर वचन बोलकर उनके हृदय, वाणी तथा मनको शान्त कर दें ।। नामहापुरुषः कश्चिन्नानात्मा नासहायवान् । महतीं धुरमाधत्ते तामुद्यम्योरसा वह ।। २३ ।।