महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 562, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्धकारमय दुर्गको अग्निके प्रकाशसे तथा जल-दुर्गको नौकाओंद्धारा पार किया जा सकता है; परंतु राजारूपी दुर्गसे पार होनेके लिये विद्वान् पुरुष भी कोई उपाय नहीं जानते हैं ।। ४१ ।।
गहनं भवतो राज्यमन्धकारं तमोऽन्वितम् । नेह विश्वसितुं शक्यं भवतापि कुतो मया ।। ४२ ।। आपका यह राज्य गहन अन्धकारसे आच्छन्न और दुःखसे परिपूर्ण है। आप स्वयं भी इस राज्यपर विश्वास नहीं कर सकते; फिर मैं कैसे करूँगा ।। ४२ ।।
अतो नायं शुभो वासस्तुल्ये सदसती इह । वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशयः ।। ४३ ।। अतः यहाँ रहनेमें किसीका कल्याण नहीं है। यहाँ भले-बुरे सब एक समान हैं। इस राज्यमें बुराई करनेवाले और भलाई करनेवालेका भी वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है ।। ४३ ।।
न्यायतो दुष्कृते घातः सुकृते न कथंचन । नेह युक्तं स्थिरं स्थातुं जवेनैवाव्रजेद् बुधः ।। ४४ ।। न्यायकी बात तो यह है कि बुराई करनेवालेको ही मारा जाय और पुण्य—श्रेष्ठ कर्म करनेवालेको किसी तरह भी कोई कष्ट न होने पावे, परंतु यहाँ ऐसा नहीं होता; अतः इस राज्यमें स्थिरभावसे निवास करना किसीके लिये भी उचित नहीं है। विद्वान् पुरुषको यहाँसे अति शीघ्र हट जाना चाहिये ।। ४४ ।।
सीता नाम नदी राजन् प्लवो यस्यां निमज्जति । तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ।। ४५ ।। राजन्! सीता नामसे प्रसिद्ध एक नदी है, जिसमें नाव भी डूब जाती है, वैसी ही यहाँकी राजनीति भी है (इसमें मेरे जैसे सहायकोंके भी डूब जानेकी आशङ्का है)। मैं तो इसे समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली फाँसी ही समझता हूँ ।। ४५ ।।
मधुप्रपातो हि भवान् भोजनं विषसंयुक्तम् । असतामिव ते भावो वर्तते न सतामिव ।। ४६ ।। आप शहदके छत्तेसे युक्त पेड़की उस ऊँची डालीके समान हैं, जहाँसे नीचे गिरनेका ही भय है। आप विष मिलाये हुए भोजनके तुल्य हैं, आपका भाव असज्जनोंके समान है, सज्जनोंके तुल्य नहीं है ।। ४६ ।।
आशीविषैः परिवृतः कूपस्त्वमसि पार्थिव । दुर्गतीर्था बृहत्कूला कारीरा वेत्रसंयुता ।। ४७ ।। नदी मधुरपानीया यथा राजंस्तथा भवान् ।