भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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भी अपने गुप्त विचारों तथा छिद्रोंको छिपाये रखना चाहिये ।। ४९ ।।

मन्त्रगूढा हि राज्यस्य मन्त्रिणो ये मनीषिणः ।

मन्त्रसंहननो राजा मन्त्राङ्गानीतरे जनाः ।। ५० ।।

जो बुद्धिमान् मन्त्री हैं, वे राज्यके गुप्त मन्त्रको छिपाये रखते हैं; क्योंकि मन्त्र ही

राजाका कवच है और सदस्य आदि दूसरे लोग मन्त्रणाके अंग हैं ।। ५० ।।

राज्यं प्रणिधिमूलं हि मन्त्रसारं प्रचक्षते ।

स्वामिनं त्वनुवर्तन्ते वृत्त्यर्थमिह मन्त्रिणः ।। ५१ ।।

विद्वान् पुरुष कहते हैं कि राज्यका मूल है गुप्तचर और उसका सार है गुप्त मन्त्रणा।

मन्त्रीलोग तो यहाँ अपनी जीविकाके लिये ही राजाका अनुसरण करते हैं ।।

संविनीय मदक्रोधौ मानमीर्ष्यां च निर्वृताः ।

नित्यं पञ्चोपधातीतैर्मन्त्रयेत् सह मन्त्रिभिः ।। ५२ ।।

जो मद और क्रोधको जीतकर मान और ईर्ष्यासे रहित हो गये हैं तथा जो कायिक,

वाचिक, मानसिक, कर्मकृत और संकेतजनित—इन पाँचों प्रकारके छलोंको लाँघकर ऊपर

उठे हुए हैं, ऐसे मन्त्रियोंके साथ ही राजाको सदा गुप्त मन्त्रणा करनी चाहिये ।। ५२ ।।

तेषां त्रयाणां विविधं विमर्शं

विबुद्ध्य चित्तं विनिवेश्य तत्र ।

स्वनिश्चयं तं परनिश्चयं च

निवेदयेदुत्तरमन्त्रकाले ।। ५३ ।।

राजा पहले सदा तीनों मन्त्रियोंकी पृथक्-पृथक् सलाह जानकर उसपर मनोयोगपूर्वक

विचार करे। तत्पश्चात् बादमें होनेवाली मन्त्रणाके समय अपने तथा दूसरोंके निश्चयको

राजगुरुकी सेवामें निवेदन करे ।। ५३ ।।

धर्मार्थकामज्ञमुपेत्य पृच्छेद्

युक्तो गुरुं ब्राह्मणमुत्तरार्थम् ।

निष्ठा कृता तेन यदा सहः स्यात्

तं मन्त्रमार्गं प्रणयेदसक्तः ।। ५४ ।।

राजा सावधान होकर धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता ब्राह्मणगुरुके समीप जा उनका

उत्तर जाननेके लिये उनकी राय पूछे। जब वे कोई निर्णय दे दें और वह सब लोगोंको एक

मतसे स्वीकार हो जाय, तब राजा दूसरे किसी विचारमें न पड़कर उसी मन्त्रमार्ग

(विचारपद्धति) को कार्यरूपमें परिणत करे ।। ५४ ।।

एवं सदा मन्त्रयितव्यमाहु-

र्ये मन्त्रतत्त्वार्थविनिश्चयज्ञाः ।

तस्मात् तमेवं प्रणयेत् सदैव

मन्त्रं प्रजासंग्रहणे समर्थम् ।। ५५ ।।