महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुरशीतितमोऽध्यायः
इन्द्र और बृहस्पतिके संवादमें सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन बोलनेका महत्त्व
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतेश्च संवादं शक्रस्य च युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस विषयमें मनस्वी पुरुष इन्द्र और बृहस्पतिके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, वह सुनो ॥ १ ॥
शक्र उवाच
किं स्विदेकपदं ब्रह्मन् पुरुषः सम्यगाचरन् ।
प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥ २ ॥
इन्द्रने पूछा— ब्रह्मन्! वह कौन-सी ऐसी एक वस्तु है, जिसका नाम एक ही पदका है और जिसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियोंका प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
बृहस्पतिरुवाच
सान्त्वमेकपदं शक्र पुरुषः सम्यगाचरन् ।
प्रमाणं सर्वभूतानां यशश्चैवाप्नुयान्महत् ॥ ३ ॥
बृहस्पतिजीने कहा— इन्द्र! जिसका नाम एक ही पदका है, वह एकमात्र वस्तु है सान्त्वना (मधुर वचन बोलना)। उसका भलीभाँति आचरण करनेवाला पुरुष समस्त प्राणियोंका प्रिय होकर महान् यश प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥
एतदेकपदं शक्र सर्वलोकसुखावहम् ।
आचरन् सर्वभूतेषु प्रियो भवति सर्वदा ॥ ४ ॥
शक्र! यही एक वस्तु सम्पूर्ण जगत्के लिये सुखदायक है। इसको आचरणमें लानेवाला मनुष्य सदा समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है ॥ ४ ॥
यो हि नाभाषते किंचित् सर्वदा भ्रुकुटीमुखः ।
द्वेष्यो भवति भूतानां स सान्त्वमिह नाचरन् ॥ ५ ॥
जो मनुष्य सदा भौंहें टेढ़ी किये रहता है, किसीसे कुछ बातचीत नहीं करता, वह शान्तभाव (मृदुभाषी होनेके गुण) को न अपनानेके कारण सब लोगोंके द्वेषका पात्र हो जाता है ॥ ५ ॥
यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पूर्वमेवाभिभाषते ।