महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 580, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें**भीष्मजीने कहा—**महाप्राज्ञ! परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर! तुम जैसा कहते हो, वह ठीक ऐसा ही है। वस्तुतः इन सभी शुभ गुणोंसे सम्पन्न किसी एक पुरुषका मिलना कठिन है॥ ५॥ किंतु संक्षेपतः शीलं प्रयत्नेनेह दुर्लभम्। वक्ष्यामि तु यथामात्यान् यादृशांश्च करिष्यसि॥ ६॥ इसलिये तुम जिस भावसे जैसे मन्त्रियोंको संगठित करोगे अर्थात् करना चाहते हो, उनका दुर्लभ शील-स्वभाव जैसा होना चाहिये—इस बातको मैं प्रयत्नपूर्वक संक्षेपसे बताऊँगा॥ ६॥ चतुरो ब्राह्मणान् वैद्यान् प्रगल्भान् स्नातकान् शुचीन्। क्षत्रियांश्च तथा चाष्टौ बलिनः शस्त्रपाणिनः॥ ७॥ वैश्यान् वित्तेन सम्पन्नानेकविंशतिसंख्यया। त्रींश्च शूद्रान् विनीतांश्च शुचीन् कर्मणि पूर्वके॥ ८॥ अष्टाभिश्च गुणैर्युक्तं सूतं पौराणिकं तथा। पञ्चाशद्वर्षवयसं प्रगल्भमनसूयकम्॥ ९॥ श्रुतिस्मृतिसमायुक्तं विनीतं समदर्शिनम्। कार्ये विवदमानानां शक्तमर्थेष्वलोलुपम्॥ १०॥ वर्जितं चैव व्यसनैः सुघोरैः सप्तभिर्भृशम्। अष्टानां मन्त्रिणां मध्ये मन्त्रं राजोपधारयेत्॥ ११॥ राजाको चाहिये कि जो वेदविद्याके विद्वान्, निर्भीक, बाहर-भीतरसे शुद्ध एवं स्नातक हों, ऐसे चार ब्राह्मण, शरीरसे बलवान् तथा शस्त्रधारी आठ क्षत्रिय, धन-धान्यसे सम्पन्न इक्कीस वैश्य, पवित्र आचार-विचारवाले तीन विनयशील शूद्र तथा आठ³ गुणोंसे युक्त एवं पुराणविद्याको जाननेवाला एक सूत जातिका मनुष्य—इन सब लोगोंका एक मन्त्रिमण्डल बनावे। उस सूतकी अवस्था लगभग पचास वर्षकी हो और वह निर्भीक, दोषदृष्टिसे रहित, श्रुतियों और स्मृतियोंके ज्ञानसे सम्पन्न, विनयशील, समदर्शी, वादी-प्रतिवादीके मामलोंका निपटारा करनेमें समर्थ, लोभरहित और अत्यन्त भयंकर सात³ प्रकारके दुर्व्यसनोंसे बहुत दूर रहनेवाला हो। ऐसे आठ मन्त्रियोंके बीचमें राजा गुप्त मन्त्रणा करे॥ ७—११॥ ततः सम्प्रेषयेद् राष्ट्रे राष्ट्रियाय च दर्शयेत्। अनेन व्यवहारेण द्रष्टव्यास्ते प्रजाः सदा॥ १२॥ इन सबकी रायसे जो बात निश्चित हो, उसको देशमें प्रचारित करे और राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकको इसका ज्ञान करा दे। युधिष्ठिर! इस प्रकारके व्यवहारसे तुम्हें सदा प्रजावर्गकी देख-रेख करनी चाहिये॥ १२॥ न चापि गूढं द्रव्यं ते ग्राह्यं कार्योपघातकम्।