भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 582

वियोजयेद् धनैर्ऋद्धानधनानथ बन्धनैः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् अपराधियोंको अपराधके अनुरूप दण्ड देना चाहिये। अपराधी धनी हो तो उसको उसकी सम्पत्तिसे वञ्चित कर दे और निर्धन हो तो उसे बन्दी बनाकर कारागारमें डाल दे ॥ २० ॥

विनयेच्चापि दुर्द्वृत्तान् प्रहारैरपि पार्थिवः । सान्त्वेनोपप्रदानेन शिष्टांश्च परिपालयेत् ॥ २१ ॥ जो अत्यन्त दुराचारी हों, उन्हें मार-पीटकर भी राजा राहपर लानेका प्रयत्न करे तथा जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उन्हें मीठी वाणीसे सान्त्वना देते हुए सुख-सुविधाकी वस्तुएँ अर्पित करके उनका पालन करे ॥ २१ ॥

राज्ञो वधं चिकीर्षेद् यस्तस्य चित्रो वधो भवेत् । आदीपकस्य स्तेनस्य वर्णसंकरिकस्य च ॥ २२ ॥ जो राजाका वध करनेकी इच्छा करे, जो गाँव या घरमें आग लगावे, चोरी करे अथवा व्यभिचारद्वारा वर्णसंकरता फैलानेका प्रयत्न करे, ऐसे अपराधीका वध अनेक प्रकारसे करना चाहिये ॥ २२ ॥

सम्यक् प्रणयतो दण्डं भूमिपस्य विशाम्पते । युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एव हि शाश्वतः ॥ २३ ॥ प्रजानाथ! जो भलीभाँति विचार करके अपराधीको उचित दण्ड देता है और अपने कर्त्तव्यपालनके लिये सदा उद्यत रहता है, उस राजाको वध और बन्धनका पाप नहीं लगता, अपितु उसे सनातन धर्मकी ही प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥

कामकारेण दण्डं तु यः कुर्यादविचक्षणः । स इहाकीर्तिसंयुक्तो मृतो नरकमृच्छति ॥ २४ ॥ जो अज्ञानी नरेश बिना विचारे स्वेच्छापूर्वक दण्ड देता है, वह इस लोकमें तो अपयशका भागी होता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है ॥ २४ ॥

न परस्य प्रवादेन परेषां दण्डमर्पयेत् । आगमानुगमं कृत्वा बध्नीयान्मोक्षयीत वा ॥ २५ ॥ राजा दूसरेके अपराधपर दूसरोंको दण्ड न दे, बल्कि शास्त्रके अनुसार विचार करके अपराध सिद्ध होता हो तो अपराधीको कैद करे और सिद्ध न होता हो तो उसे मुक्त कर दे ॥ २५ ॥

न तु हन्यान्नृपो जातु दूतं कस्याञ्चिदापदि । दूतस्य हन्ता निरयमाविशेत् सचिवैः सह ॥ २६ ॥ राजा कभी किसी आपत्तिमें भी किसीके दूतकी हत्या न करे। दूतका वध करनेवाला नरेश अपने मन्त्रियोंसहित नरकमें गिरता है ॥ २६ ॥

यथोक्तवादिनं दूतं क्षत्रधर्मरतो नृपः ।