महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 586, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत्पुरं दुर्गसम्पन्नं धान्यायुधसमन्वितम् । दृढप्राकारपरिखं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ ६ ॥ विद्वांसः शिल्पिनो यत्र निचयाश्च सुसंचिताः । धार्मिकश्च जनो यत्र दाक्ष्यमुत्तममास्थितः ॥ ७ ॥ ऊर्जस्विनरनागाश्वं चत्वरापणशोभितम् । प्रसिद्धव्यवहारं च प्रशान्तमकुतोभयम् ॥ ८ ॥ सुप्रभं सानुनादं च सुप्रशस्तनिवेशनम् । शूराढ्यजनसम्पन्नं ब्रह्मघोषानुनादितम् ॥ ९ ॥ समाजोत्सवसम्पन्नं सदा पूजितदैवतम् । वश्यामात्यबलो राजा तत्पुरं स्वयमाविशेत् ॥ १० ॥ जिस नगरमें इनमेंसे कोई-न-कोई दुर्ग हो, जहाँ अन्न और अस्त्र-शस्त्रोंकी अधिकता हो, जिसके चारों ओर मजबूत चहारदीवारी और गहरी एवं चौड़ी खाई बनी हो, जहाँ हाथी, घोड़े और रथोंकी बहुतायत हो, जहाँ विद्वान् और कारीगर बसे हों, जिस नगरमें आवश्यक वस्तुओंके संग्रहसे भरे हुए कई भंडार हों, जहाँ धार्मिक तथा कार्यकुशल मनुष्योंका निवास हो, जो बलवान् मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे सम्पन्न हो, चौराहे तथा बाजार जिसकी शोभा बढ़ा रहे हों, जहाँका न्याय-विचार एवं न्यायालय सुप्रसिद्ध हो, जो सब प्रकारसे शान्तिपूर्ण हो, जहाँ कहींसे कोई भय या उपद्रव न हो, जिसमें रोशनीका अच्छा प्रबन्ध हो, संगीत और वाद्योंकी ध्वनि होती रहती हो, जहाँका प्रत्येक घर सुन्दर और सुप्रशस्त हो, जिसमें बड़े-बड़े शूरवीर और धनाढ्य लोग निवास करते हों, वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती हो तथा जहाँ सदा ही सामाजिक उत्सव और देवपूजनका क्रम चलता रहता हो, ऐसे नगरके भीतर अपने वशमें रहनेवाले मन्त्रियों तथा सेनाके साथ राजाको स्वयं निवास करना चाहिये ॥ ६—१० ॥
तत्र कोशं बलं मित्रं व्यवहारं च वर्धयेत् । पुरे जनपदे चैव सर्वदोषान् निवर्तयेत् ॥ ११ ॥ राजाको चाहिये कि वह उस नगरमें कोष, सेना, मित्रोंकी संख्या तथा व्यवहारको बढ़ावे। नगर तथा बाहरके ग्रामोंमें सभी प्रकारके दोषोंको दूर करे ॥ ११ ॥
भाण्डागारायुधागारं प्रयत्नेनाभिवर्धयेत् । निचयान् वर्धयेत् सर्वांस्तथा यन्त्रायुधालयान् ॥ १२ ॥ अन्नभण्डार तथा अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहालयको प्रयत्नपूर्वक बढ़ावे, सब प्रकारकी वस्तुओंके संग्रहालयोंकी भी वृद्धि करे, यन्त्रों तथा अस्त्र-शस्त्रोंके कारखानोंकी उन्नति करे ॥ १२ ॥
काष्ठलोहतुषाङ्गारदारुशृङ्गास्थिवैणवान् । मज्जा स्नेहवसा क्षौद्रमौषधग्राममेव च ॥ १३ ॥