भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 601

जो राजा इन पापियोंको नियन्त्रणमें नहीं रखता, वह स्वयं भी पापाचारी माना जाता है तथा जो पापियोंका दमन करता है, वह प्रजाके किये हुए धर्मका चौथाई भाग स्वयं प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ स्थानान्येतानि संयम्य प्रसंगो भूतिनाशनः । कामे प्रसक्तः पुरुषः किमकार्यं विवर्जयेत् ॥ २१ ॥ ऊपर जो मदिरालय तथा वेश्यालय आदि स्थान बताये गये हैं, उनपर रोक लगा देनी चाहिये; क्योंकि इससे कामविषयक आसक्ति बढ़ती है। जो धन-वैभव तथा कल्याणका नाश करनेवाली है। काममें आसक्त हुआ पुरुष कौन-सा ऐसा न करनेयोग्य काम है, जिसे छोड़ दे? ॥ २१ ॥ मद्यमांसपरस्वानि तथा दारा धनानि च । आहरेद् रागवशगस्तथा शास्त्रं प्रदर्शयेत् ॥ २२ ॥ आसक्तिके वशीभूत हुआ मानव मांस खाता, मदिरा पीता और परधन तथा परस्त्रीका अपहरण करता है। साथ ही दूसरोंको भी यही सब करनेका उपदेश देता है ॥ २२ ॥ आपद्येव तु याचन्ते येषां नास्ति परिग्रहः । दातव्यं धर्मतस्तेभ्यस्त्वनुक्रोशाद् भयान्न तु ॥ २३ ॥ जिन लोगोंके पास कुछ भी संग्रह नहीं है, वे यदि आपत्तिके समय ही याचना करें तो उन्हें धर्म समझकर और दया करके ही देना चाहिये, किसी भय या दबावमें पड़कर नहीं ॥ २३ ॥ मा ते राष्ट्रे याचनका भूवन्मा चापि दस्यवः । एषां दातार एवैते नैते भूतस्य भावकाः ॥ २४ ॥ तुम्हारे राज्यमें भिखमंगे और लुटेरे न हों; क्योंकि ये प्रजाके धनको केवल छीननेवाले हैं, उनके ऐश्वर्यको बढ़ानेवाले नहीं हैं ॥ २४ ॥ ये भूतान्यनुगृह्णन्ति वर्धयन्ति च ये प्रजाः । ते ते राष्ट्रेषु वर्तन्तां मा भूतानामभावकाः ॥ २५ ॥ जो सब प्राणियोंपर दया करते और प्रजाकी उन्नतिमें योग देते हैं, वे तुम्हारे राष्ट्रमें निवास करें। जो लोग प्राणियोंका विनाश करनेवाले हैं, वे न रहें ॥ दण्ड्यास्ते च महाराज धनादानप्रयोजकाः । प्रयोगं कारयेयुस्तान् यथाबलिकरांस्तथा ॥ २६ ॥ महाराज! जो राजकर्मचारी उचितसे अधिक कर वसूल करते या कराते हों, वे तुम्हारे हाथसे दण्ड पानेके योग्य हैं। दूसरे अधिकारी आकर उन्हें ठीक-ठीक भेंट या कर लेनेका अभ्यास करावें ॥ २६ ॥ कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यच्चान्यत् किंचिदीदृशम् । पुरुषैः कारयेत् कर्म बहुभिः कर्मभेदतः ॥ २७ ॥