भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 606

आत्मानं सर्वतो रक्षन् राजन् रक्षस्व मेदिनीम् । आत्ममूलमिदं सर्वमाहुर्वै विदुषो जनाः ॥ १३ ॥ राजन्! तुम सब ओरसे अपनी रक्षा करते हुए ही इस सारी पृथिवीकी रक्षा करो; क्योंकि विद्वान् पुरुषोंका कहना है कि इन सबका मूल अपना सुरक्षित शरीर ही है ॥ १३ ॥ किं छिद्रं को नु सङ्गो मे किं वास्त्यविनिपातितम् । कुतो मामाश्रयेद् दोष इति नित्यं विचिन्तयेत् ॥ १४ ॥ मुझमें कौन-सी दुर्बलता है, किस तरहकी आसक्ति है और कौन-सी ऐसी बुराई है, जो अबतक दूर नहीं हुई है और किस कारणसे मुझपर दोष आता है? इन सब बातोंका राजाको सदा विचार करते रहना चाहिये ॥ १४ ॥ अतीतदिवसे वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः । गुप्तैश्चारैरनुमतैः पृथिवीमनुसारयेत् ॥ १५ ॥ कलतक मेरा जैसा बर्ताव रहा है, उसकी लोग प्रशंसा करते हैं या नहीं? इस बातका पता लगानेके लिये अपने विश्वासपात्र गुप्तचरोंको पृथिवीपर सब ओर घुमाते रहना चाहिये ॥ १५ ॥ जानीयुर्यदि ते वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः । कच्चिद् रोचेज्जनपदे कच्चिद् राष्ट्रे च मे यशः ॥ १६ ॥ उनके द्वारा यह भी पता लगाना चाहिये कि यदि अबसे लोग मेरे बर्तावको जान लें तो उसकी प्रशंसा करेंगे या नहीं। क्या बाहरके गाँवोंमें और समूचे राष्ट्रमें मेरा यश लोगोंको अच्छा लगता है? ॥ १६ ॥ धर्मज्ञानां धृतिम तां संग्रामेष्वपलायिनाम् । राष्ट्रे तु येऽनुजीवन्ति ये तु राज्ञोऽनुजीविनः ॥ १७ ॥ अमात्यानां च सर्वेषां मध्यस्थानां च सर्वशः । ये च त्वाभिप्रशंसेयुर्निन्देयुरथवा पुनः ॥ १८ ॥ सर्वान् सुपरिणीतांस्तान् कारयेथा युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! जो धर्मज्ञ, धैर्यवान् और संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले शूरवीर हैं, जो राज्यमें रहकर जीविका चलाते हैं अथवा राजाके आश्रित रहकर जीते हैं तथा जो मन्त्रिगण और तटस्थवर्गके लोग हैं, वे सब तुम्हारी प्रशंसा करें या निन्दा, तुम्हें सबका सत्कार ही करना चाहिये ॥ १७-१८ १/२ ॥ एकान्तेन हि सर्वेषां न शक्यं तात रोचितुम् । मित्रामित्रमथो मध्यं सर्वभूतेषु भारत ॥ १९ ॥ तात! किसीका कोई भी काम सबको सर्वथा अच्छा ही लगे, ऐसा सम्भव नहीं है, भरतनन्दन! सभी प्राणियोंके शत्रु, मित्र और मध्यस्थ होते हैं ॥ १९ ॥