महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 634, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब राजा साम, दान और भेद—तीनोंका प्रयोग निष्फल देखे, तब शत्रु की दुर्बलताका पता लगाकर दूसरा कोई विचार मनमें न लाते हुए दण्डनीतिका ही प्रयोग करे—शत्रुके साथ युद्ध छेड़ दे ॥ पौरजानपदा यस्य भूतेषु च दयालवः । सधना धान्यवन्तश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥ ५ ॥ जिसके नगर और जनपदमें रहनेवाले लोग समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले और धन-धान्यसे सम्पन्न होते हैं, उस राजाकी जड़ मजबूत समझी जाती है ॥ (राष्ट्रकर्मकरा ह्येते राष्ट्रस्य च विरोधिनः । दुर्विनीता विनीताश्च सर्वे साध्याः प्रयत्नतः ॥ ये नगर और जनपदके लोग राष्ट्रके कार्यकी सिद्धि करनेवाले और उसके विरोधी भी होते हैं। उद्दण्ड और विनयशील भी होते हैं। उन सबको प्रयत्नपूर्वक अपने वशमें करना चाहिये ॥ चाण्डालम्लेच्छजात्याश्च पाषण्डाश्च विकर्मिणः । बलिनश्चाश्रमाश्चैव तथा गायकनर्तकाः ॥ यस्य राष्ट्रे वसन्त्येते धान्योपचयकारिणः । आयवृद्धौ सहायाश्च दृढमूलः स पार्थिवः ॥) चाण्डाल, म्लेच्छ, पाखण्डी, शास्त्र-विरुद्ध कर्म करनेवाले, बलवान्, सभी आश्रमोंके निवासी तथा गायक और नर्तक—इन सबको प्रयत्नपूर्वक वशमें करना चाहिये। जिसके राज्यमें ये सब लोग धन-धान्यकी वृद्धि करनेवाले और आय बढ़ानेमें सहायक होकर रहते हैं, उस राजाकी जड़ मजबूत समझी जाती है ॥ प्रतापकालमधिकं यदा मन्येत चात्मनः । तदा लिप्सेत मेधावी परभूमिधनान्युत ॥ ६ ॥ बुद्धिमान् राजा जब अपने प्रतापको प्रकाशित करनेका उपयुक्त अवसर समझे, तभी दूसरेका राज्य और धन लेनेकी चेष्टा करे ॥ ६ ॥ भोगेष्वदयमानस्य भूतेषु च दयावतः । वर्धते त्वरमाणस्य विषयो रक्षितात्मनः ॥ ७ ॥ जिसके वैभव-भोग दिनोंदिन बढ़ रहे हों, जो सब प्राणियोंपर दया रखता हो, काम करनेमें फुर्तीला हो और अपने शरीरकी रक्षाका ध्यान रखता हो, उस राजाकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ॥ ७ ॥ तक्षेदात्मानमेवं स वनं परशुना यथा । यः सम्यग् वर्तमानेषु स्वेषु मिथ्या प्रवर्तते ॥ ८ ॥ जो अच्छा बर्ताव करनेवाले स्वजनोंके प्रति मिथ्या व्यवहार करता है, वह इस बर्तावद्वारा कुल्हाड़ीसे जंगलकी भाँति अपने आपका ही उच्छेद कर डालता है ॥ ८ ॥