महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 637, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकथं सम्प्रति योद्धव्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥ युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि कोई क्षत्रिय राजा दूसरे क्षत्रिय राजापर चढ़ाई कर दे तो उस समय उसे उसके साथ किस प्रकार युद्ध करना चाहिये यह मुझे बताइये ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
नैवासन्नद्धकवचो योद्धव्यः क्षत्रियो रणे ।
एक एकेन वाच्यश्च विसृजेति क्षिपामि च ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो कवच बाँधे हुए न हो, उस क्षत्रियके साथ रणभूमिमें युद्ध नहीं करना चाहिये। एक योद्धा दूसरे एकाकी योद्धासे कहे ‘तुम मुझपर शस्त्र छोड़ो। मैं भी तुमपर प्रहार करता हूँ’ ॥ ७ ॥
स चेत् सन्नद्ध आगच्छेत् सन्नद्धव्यं ततो भवेत् ।
स चेत् ससैन्य आगच्छेत् ससैन्यस्तमथाह्वयेत् ॥ ८ ॥
यदि वह कवच बाँधकर सामने आ जाय तो स्वयं भी कवच धारण कर ले। यदि विपक्षी सेनाके साथ आवे तो स्वयं भी सेनाके साथ आकर शत्रुको ललकारे ॥ ८ ॥
स चेन्निकृत्या युद्ध्येत निकृत्या प्रतियोधयेत् ।
अथ चेद् धर्मतो युद्ध्येद् धर्मेणैव निवारयेत् ॥ ९ ॥
यदि वह छलसे युद्ध करे तो स्वयं भी उसी रीतिसे उसका सामना करे और यदि वह धर्मसे युद्ध आरम्भ करे तो धर्मसे ही उसका सामना करना चाहिये ॥
नाश्वेन रथिनं यायादुदियाद् रथिनं रथी ।
व्यसने न प्रहर्तव्यं न भीताय जिताय च ॥ १० ॥
घोड़ेके द्वारा रथीपर आक्रमण न करे। रथीका सामना रथीको ही करना चाहिये। यदि शत्रु किसी संकटमें पड़ जाय तो उसपर प्रहार न करे। डरे और पराजित हुए शत्रुपर भी कभी प्रहार नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥
इषुर्लिप्तो न कर्णी स्यादसतामेतदायुधम् ।
यथार्थमेव योद्धव्यं न क्रुद्ध्येत जिघांसतः ॥ ११ ॥
युद्धमें विषलिप्त और कर्णी बाणका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ये दुष्टोंके अस्त्र हैं। यथार्थ रीतिसे ही युद्ध करना चाहिये। यदि कोई व्यक्ति युद्धमें किसीका वध करना चाहता हो तो उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये (किंतु यथायोग्य प्रतीकार करना चाहिये) ॥ ११ ॥
साधूनां तु मिथो भेदात् साधुश्चेद् व्यसनी भवेत् ।
निष्प्राणो नाभिहन्तव्यो नानपत्यः कथंचन ॥ १२ ॥
जब श्रेष्ठ पुरुषोंमें परस्पर भेद होनेसे कोई श्रेष्ठ पुरुष संकटमें पड़ जाय, तब उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये। जो बलहीन और संतानहीन हो, उसपर तो किसी प्रकार भी आघात न करे ॥ १२ ॥