भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 647, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 647

मा स्म तांस्तादृशांस्तात जनिष्ठाः पुरुषाधमान् । ये सहायान् रणे हित्वा स्वस्तिमन्तो गृहान् ययुः ॥ २० ॥ तात! जो लोग रणभूमिमें अपने सहायकोंको छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर लौट जाते हैं, वैसे नराधमोंको तुम कभी पैदा मत करना ॥ २० ॥ अस्वस्ति तेभ्यः कुर्वन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः । त्यागेन यः सहायानां स्वान् प्राणांस्त्रातुमिच्छति ॥ २१ ॥ तं हन्युः काष्ठलोष्ठैर्वा दहेयुर्वा कटाग्निना । पशुवन्मारयेयुर्वा क्षत्रिया ये स्युरीदृशाः ॥ २२ ॥ उनके लिये इन्द्र आदि देवता अमंगल मनाते हैं। जो सहायकोंको छोड़कर अपने प्राण बचानेकी इच्छा रखता है, ऐसे कायरको उसके साथी क्षत्रिय लाठी या ढेलोंसे पीटें अथवा घासके ढेरकी आगमें जला दें या उसे पशुकी भाँति गला घोटकर मार डालें ॥ २१-२२ ॥ अधर्मः क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत् । विसृजन् श्लेष्ममूत्राणि कृपणं परिदेवयन् ॥ २३ ॥ अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति । क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥ २४ ॥ खाटपर सोकर मरना क्षत्रियके लिये अधर्म है। जो क्षत्रिय कफ और मल-मूत्र छोड़ता तथा दुखी होकर विलाप करता हुआ बिना घायल हुए शरीरसे मृत्युको प्राप्त हो जाता है, उसके इस कर्मकी प्राचीन धर्मको जानने-वाले विद्वान् पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ २३-२४ ॥ न गृहे मरणं तात क्षत्रियाणां प्रशस्यते । शौटीराणामशौटीर्यमधर्मं कृपणं च तत् ॥ २५ ॥ क्योंकि तात! वीर क्षत्रियोंका घरमें मरण हो, यह उनके लिये प्रशंसाकी बात नहीं है। वीरोंके लिये यह कायरता और दीनता अधर्मकी बात है ॥ २५ ॥ इदं दुःखं महत् कष्टं पापीय इति निष्टनन् । प्रतिध्वस्तमुखः पूतिरमात्याननुशोचयन् ॥ २६ ॥ अरोगाणां स्पृहयते मुहुर्मृत्युमपीच्छति । वीरो दृप्तोऽभिमानी च नेदृशं मृत्युमर्हति ॥ २७ ॥ ‘यह बड़ा दुःख है। बड़ी पीड़ा हो रही है! यह मेरे किसी महान् पापका सूचक है।’ इस प्रकार आर्तनाद करना, विकृत-मुख हो जाना, दुर्गन्धित शरीरसे मन्त्रियोंके लिये निरन्तर शोक करना, नीरोग मनुष्योंकी-सी स्थिति प्राप्त करनेकी कामना करना और वर्तमान रुग्णावस्थामें बारंबार मृत्युकी इच्छा रखना—ऐसी मौत किसी स्वाभिमानी वीरके योग्य नहीं है ॥ २६-२७ ॥ रणेषु कदनं कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः ।