भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 652

सुदेवस्तद्वचः श्रुत्वा प्रस्थानमकरोन्नृप ।। सम्प्राप्तश्च स तं देशं यत्र बन्दीकृताः प्रजाः । पश्यति स्म महाघोरां राक्षसानां महाचमूम् ।। नरेश्वर! आपकी वह बात सुनकर सुदेवने तुरंत ही प्रस्थान किया और वह उस स्थानपर गया, जहाँ आपकी प्रजा बंदी बना ली गयी थी। उसने वहाँ राक्षसोंकी महाभयंकर विशाल सेना देखी ।। दृष्ट्वा संचिन्तयामास सुदेवो वाहिनीपतिः । नेयं शक्या चमूर्जेतुमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः ।। नाम्बरीषः कलामेकामेषां क्षपयितुं क्षमः । दिव्यास्त्रबलभूयिष्ठः किमहं पुनरीदृशः ।। उसे देखकर सेनापति सुदेवने सोचा कि यह विशाल वाहिनी तो इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंसे भी नहीं जीती जा सकती। महाराज अम्बरीष दिव्य अस्त्र एवं दिव्य बलसे सम्पन्न हैं, परंतु वे इस सेनाके सोलहवें भागका भी संहार करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब उनकी यह दशा है, तब मेरे-जैसा साधारण सैनिक इस सेनापर कैसे विजय पा सकता है? ।। ततः सेनां पुनः सर्वां प्रेषयामास पार्थिव । यत्र त्वं सहितः सर्वैर्मन्त्रिभिः सोपधैर्नृप ।। राजन्! यह सोचकर सुदेवने फिर सारी सेनाको वहीं वापस भेज दिया, जहाँ आप उन समस्त कपटी मन्त्रियोंके साथ विराजमान थे ।। ततो रुद्रं महादेवं प्रपन्नो जगतः पतिम् । श्मशाननिलयं देवं तुष्टाव वृषभध्वजम् ।। तदनन्तर सुदेवने श्मशानवासी महादेव जगदीश्वर रुद्रदेवकी शरण ली और उन भगवान् वृषभध्वजका स्तवन किया ।। स्तुत्वा शस्त्रं समादाय स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतः । कारुण्याद् देवदेवेन गृहीतस्तस्य दक्षिणः ।। सपाणिः सह शस्त्रेण दृष्ट्वा चेदमुवाच ह । स्तुति करके वह खड्ग हाथमें लेकर अपना सिर काटनेको उद्यत हो गया। तब देवाधिदेव महादेवने करुणावश सुदेवका वह खड्गसहित दाहिना हाथ पकड़ लिया और उसकी ओर स्नेहपूर्वक देखकर इस प्रकार कहा ।।

रुद्र उवाच

किमिदं साहसं पुत्र कर्तुकामो वदस्व मे । रुद्र बोले—पुत्र! तुम ऐसा साहस क्यों करना चाहते हो? मुझसे कहो ।।

इन्द्र उवाच