महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 654, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंरुद्र बोले—सुदेव! तुम इस रथके कारण देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हो गये हो, परंतु किसी मायासे मोहित होकर अपना पैर पृथ्वीपर न रख देना। इसपर बैठे रहोगे तो समस्त देवताओं और दानवोंको जीत लोगे। यह रथ सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी है। राक्षस और पिशाच ऐसे तेजस्वी रथकी ओर देख भी नहीं सकते; फिर तुम्हारे साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? ॥
इन्द्र उवाच स जित्वा राक्षसान् सर्वान् कृत्वा बन्दीविमोक्षणम् । घातयित्वा च तान् सर्वान् बाहुयुद्धेत्वयं हतः । वियमं प्राप्य भूपाल वियमश्च निपातितः ॥) इन्द्र कहते हैं—राजन्! तत्पश्चात् सुदेवने उस रथके द्वारा समस्त राक्षसोंको जीतकर बंदी प्रजाओंको बन्धनसे छुड़ा दिया और समस्त शत्रुओंका संहार करके वियमके साथ बाहुयुद्ध करते समय स्वयं भी मारा गया, साथ ही इसने उस युद्धमें वियमको भी मार डाला ॥
इन्द्र उवाच एतस्य विततस्तात सुदेवस्य बभूव ह । संग्रामयज्ञः सुमहान् यश्चान्यो युद्ध्यते नरः ॥ १२ ॥ इन्द्र बोले—तात! इस सुदेवने बड़े विस्तारके साथ महान् रणयज्ञ सम्पन्न किया था। दूसरा भी जो मनुष्य युद्ध करता है, उसके द्वारा इसी तरह संग्राम-यज्ञ सम्पादित होता है ॥ १२ ॥ संनद्धो दीक्षितः सर्वो योधः प्राप्य चमूमुखम् । युद्धयज्ञाधिकारस्थो भवतीति विनिश्चयः ॥ १३ ॥ कवच धारण करके युद्धकी दीक्षा लेनेवाला प्रत्येक योद्धा सेनाके मुहानेपर जाकर इसी प्रकार संग्रामयज्ञका अधिकारी होता है। यह मेरा निश्चित मत है ॥ १३ ॥
अम्बरीष उवाच कानि यज्ञे हवींष्यस्मिन् किमाज्यं का च दक्षिणा । ऋत्विजश्चात्र के प्रोक्तास्तन्मे ब्रूहि शतक्रतो ॥ १४ ॥ अम्बरीषने पूछा—शतक्रतो! इस रणयज्ञमें कौन-सा हविष्य है? क्या घृत है? कौन-सी दक्षिणा है और इसमें कौन-कौन-से ऋत्विज् बताये गये हैं? यह मुझसे कहिये ॥ १४ ॥
इन्द्र उवाच ऋत्विजः कुञ्जरास्तत्र वाजिनोऽध्वर्यवस्तथा । हवींषि परमांसानि रुधिरं त्वाज्यमुच्यते ॥ १५ ॥