भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 656

हविर्धानं तु तस्याहुः परेषां वाहिनीमुखम् ॥ २३ ॥ सेनाके मुहानेपर जो 'काट डालो', फाड़ डालो' आदिका भयंकर शब्द सुना जाता है, वही सामगान है। सैनिकरूपी सामगायक शत्रुओंको यमलोकमें भेजनेके लिये मानो सामगान करते हैं। शत्रुओंकी सेनाका प्रमुख भाग उस वीर यजमानके लिये हविर्धान (हविष्य रखनेका पात्र) बताया गया है ॥ २२-२३ ॥

कुञ्जराणां हयानां च वर्मिणां च समुच्चयः । अग्निः श्येनचितो नाम स च यज्ञे विधीयते ॥ २४ ॥ हाथी, घोड़े और कवचधारी वीर पुरुषोंके समूह ही उस युद्धयज्ञके श्येनचित नामक अग्नि हैं ॥ २४ ॥

उत्तिष्ठते कबन्धोऽत्र सहस्रे निहते तु यः । स यूपस्तस्य शूरस्य खादिरोऽष्टास्रिरुच्यते ॥ २५ ॥ सहस्रों वीरोंके मारे जानेपर जो कबन्ध खड़े दिखायी देते हैं, वे ही मानो उस शूरवीरके यज्ञमें खदिरकाष्ठके बने हुए आठ कोणवाले यूप कहे गये हैं ॥ २५ ॥

इडोपहूताः क्रोशन्ति कुञ्जरास्त्वंकुशेरिताः । व्याघुष्टतलनादेन वषट्कारेण पार्थिव ॥ २६ ॥ उद्गाता तत्र संग्रामे त्रिसामा दुन्दुभिर्नृप । राजन्! वाणीद्वारा ललकारने और महावतोंके अंकुशोंकी मार खानेपर हाथी जो चिग्घाड़ते हैं, कोलाहल और करतलध्वनिके साथ होनेवाली वह चिग्घाड़नेकी आवाज उस यज्ञमें वषट्कार है। नरेश्वर! संग्राममें जिस दुन्दुभिकी गम्भीर ध्वनि होती है, वही सामवेदके तीन मन्त्रोंका पाठ करनेवाला उद्गाता है ॥ २६ १/२ ॥

ब्रह्मस्वे ह्रियमाणे तु त्यक्त्वा युद्धे प्रियां तनुम् ॥ २७ ॥ आत्मानं यूपमुत्सृज्य स यज्ञोऽनन्तदक्षिणः । जब लुटेरे ब्राह्मणके धनका अपहरण करते हों, उस समय वीर पुरुष उनके साथ किये जानेवाले युद्धमें अपने प्रिय शरीरके त्यागके लिये जो उद्यम करता है अथवा जो देहरूपी यूपका उत्सर्ग करके प्रहार ही कर बैठता है, उसका वह युद्ध ही अनन्त दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञ कहलाता है ॥ २७ १/२ ॥

भर्तुरर्थे च यः शूरो विक्रमेद् वाहिनीमुखे ॥ २८ ॥ न भयाद् विनिवर्तेत तस्य लोका यथा मम । जो शूरवीर अपने स्वामीके लिये सेनाके मुहानेपर खड़ा होकर पराक्रम प्रकट करता है और भयसे कभी पीठ नहीं दिखाता, उसको मेरे समान लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ २८ १/२ ॥

नीलचर्मावृतैः खड्गैर्बाहुभिः परिघोपमैः ॥ २९ ॥ यस्य वेदिरुपस्तीर्णा तस्य लोका यथा मम ।

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