महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 675, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राय एव समुद्दिष्ट लक्षणानि तु मे शृणु ॥ ६ ॥ प्रायः सभी देशोंमें महान् धैर्यशाली, महाबली एवं शूरवीर पैदा होते हैं। उन सबका उल्लेख अधिकतर किया जा चुका है। अब तुम मुझसे उनके लक्षण सुनो ॥
सिंहशार्दूलवाङ्नेत्राः सिंहशार्दूलगामिनः । पारावतकुलिङ्गाक्षाः सर्वे शूराः प्रमाथिनः ॥ ७ ॥ जिनकी वाणी, नेत्र तथा चाल-ढाल सिंहों या बाघोंके समान होती है और जिनकी आँखें कबूतर या गौरैयेके समान होती हैं, वे सभी शूरवीर एवं शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥
मृगस्वरा द्वीपिनेत्रा ऋषभाक्षास्तरस्विनः । प्रमादिनश्च मन्दाश्च क्रोधनाः किङ्किणीस्वनाः ॥ ८ ॥ जिनका कण्ठस्वर मृगोंके समान और नेत्र बाघ एवं बैलोंके तुल्य होते हैं, वे वीर वेगशाली, असावधान और मूर्ख हुआ करते हैं। जिनका कण्ठनाद किंकिणीके समान मधुर हो, वे स्वभावके बड़े क्रोधी होते हैं ॥ ८ ॥
मेघस्वनाः क्रोधमुखाः केचित् करभसंनिभाः । जिह्मनासाग्रजिह्वाश्च दूरगा दूरपातिनः ॥ ९ ॥ जिनकी गर्जना मेघके समान, मुख क्रोधयुक्त, शरीर ऊँटकी तरह तथा नाक और जीभ टेढ़ी हो, वे बहुत दूरतक दौड़नेवाले तथा सुदूरवर्ती लक्ष्यको भी मार गिरानेवाले होते हैं ॥ ९ ॥
बिडालकुब्जतनवस्तनुकेशास्तनुत्वचः । शीघ्राश्चपलवृत्ताश्च ते भवन्ति दुरासदाः ॥ १० ॥ जिनका शरीर बिलावके समान कुबड़ा तथा सिरके बाल और देहकी खाल पतले होते हैं, वे शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले चंचल और दुर्जय होते हैं ॥ १० ॥
गोधानिमीलिताः केचिन्मृदुप्रकृतयस्तथा । तरङ्गगतिनिर्घोषास्ते नराः पारयिष्णवः ॥ ११ ॥ जो गोहटीके समान आँखें बन्द किये रहते हैं, जिनका स्वभाव कोमल होता है तथा जिनके चलनेपर घोड़ेकी टाप पड़ने-जैसी आवाज होती है, वे मनुष्य युद्धके पार पहुँच जाते हैं ॥ ११ ॥
सुसंहताः सुतनवो व्यूढोरस्काः सुसंस्थिताः । प्रवादितेषु कुप्यन्ति हृष्यन्ति कलहेषु च ॥ १२ ॥ जिनके शरीर गठीले, छाती चौड़ी और अंग-प्रत्यंग सुडौल होते हैं, जो युद्धमें डटकर खड़े होनेवाले हैं, वे वीर पुरुष युद्धका धौंसा सुनते ही कुपित हो उठते हैं। उन्हें लड़ने-भिड़नेमें ही आनन्द आता है ॥ १२ ॥
गम्भीराक्षा निःसृताक्षाः पिङ्गाक्षा भ्रुकुटीमुखाः ।