महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 682, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिप्रयातां समितिं ज्ञात्वा ये प्रतियान्त्यथ ।
तेषां स्यन्दन्ति गात्राणि योधानां विजयस्य च ॥ २४ ॥
जो युद्धको उपस्थित हुआ जानकर उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, उन वीरोंके शरीरमें विजयकी आशासे आनन्दजनित पसीनेके बिन्दु प्रकट हो जाते हैं ॥ २४ ॥
विषयो व्यथते राजन् सर्वः सस्थाणुजङ्गमः ।
अस्य प्रतापतप्तानां मज्जा सीदति देहिनाम् ॥ २५ ॥
राजन्! युद्ध उपस्थित होनेपर स्थावर-जंगम प्राणियोंसहित समस्त देश ही व्यथित हो उठता है और अस्त्रोंके प्रतापसे संतप्त हुए देहधारियोंकी मज्जा भी सूखने लगती है ॥ २५ ॥
तेषां सान्त्वं क्रूरमिश्रं प्रणेतव्यं पुनः पुनः ।
सम्पीड्यमाना हि परैर्योगमायान्ति सर्वतः ॥ २६ ॥
उन देशवासियोंके प्रति कठोरताके साथ-साथ सान्त्वनापूर्ण मधुर वचनोंका बारंबार प्रयोग करना चाहिये; अन्यथा केवल कठोर वचनोंसे पीड़ित हो वे सब ओरसे जाकर शत्रुओंके साथ मिल जाते हैं ॥ २६ ॥
आन्तराणां च भेदार्थं चरानभ्यवचारयेत् ।
यश्च तस्मात् परो राजा तेन सन्धिः प्रशस्यते ॥ २७ ॥
शत्रुके मित्रोंमें फूट डालनेके लिये गुप्तचरोंको भेजना चाहिये और जो शत्रुसे भी बलवान् राजा हो, उसके साथ सन्धि करना श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
न हि तस्यान्यथा पीडा शक्या कर्तुं तथाविधा ।
यथा सार्धममित्रेण सर्वतः प्रतिबाधनम् ॥ २८ ॥
अन्यथा उसको वैसी पीड़ा नहीं दी जा सकती, जैसी कि उसके शत्रुके साथ सन्धि करके दी जा सकती है। युद्ध इस प्रकार करना चाहिये, जिससे शत्रुपक्ष सब ओरसे संकटमें पड़ जाय ॥ २८ ॥
क्षमा वै साधुमायाति न ह्यसाधूंन्क्षमा सदा ।
क्षमायाश्चाक्षमायाश्च पार्थ विद्धि प्रयोजनम् ॥ २९ ॥
कुन्तीनन्दन! सत्पुरुषोंको ही सदा क्षमा करना आता है, दुष्टोंको नहीं। क्षमा करने और न करनेका प्रयोजन बताता हूँ; इसे सुनो और समझो ॥ २९ ॥
विजित्य क्षममाणस्य यशो राज्ञो विवर्धते ।
महापराधे ह्यप्यस्मिन् विश्वसन्त्यपि शत्रवः ॥ ३० ॥
जो राजा शत्रुओंको जीत लेनेके बाद उनके अपराध क्षमा कर देता है, उसका यश बढ़ता है। उसके प्रति महान् अपराध करनेपर भी शत्रु उसपर विश्वास करते हैं ॥ ३० ॥
मन्यते कर्षयित्वा तु क्षमा साध्वीति शम्बरः ।
असंतप्तं तु यद् दारु प्रत्येति प्रकृतिं पुनः ॥ ३१ ॥