महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 686, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरना चाहिये, जिससे शत्रुओंको संताप देनेवाली यह समुज्ज्वल राज्यलक्ष्मी मुझे कभी न छोड़े ॥ ५ ॥ ततो धर्मार्थकामानां कुशलः प्रतिभानवान् । राजधर्मविधानज्ञः प्रत्युवाच पुरंदरम् ॥ ६ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्म, अर्थ और कामके प्रतिपादनमें कुशल, प्रतिभाशाली तथा राजधर्मके विधानको जाननेवाले बृहस्पतिने इन्द्रको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ६ ॥ बृहस्पतिरुवाच न जातु कलहेनेच्छेन्नियन्तुमपकारिणः । बालैरासेवितं ह्येतद् यदमर्षो यदक्षमा ॥ ७ ॥ **बृहस्पतिजी बोले—**राजन्! कोई भी राजा कभी कलह या युद्धके द्वारा शत्रुओंको वशमें करनेकी इच्छा न करे। असहनशीलता अथवा क्षमाको छोड़ना, यह बालकों या मूर्खोंद्वारा सेवित मार्ग है ॥ ७ ॥ न शत्रुर्विवृतः कार्यो वधमस्याभिकाङ्क्षता । क्रोधं भयं च हर्षं च नियम्य स्वयमात्मनि ॥ ८ ॥ शत्रुके वधकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह क्रोध, भय और हर्षको अपने मनमें ही रोक ले तथा शत्रुको सावधान न करे ॥ ८ ॥ अमित्रमुपसेवेत विश्वस्तवदविश्वसन् । प्रियमेव वदेन्नित्यं नाप्रियं किंचिदाचरेत् ॥ ९ ॥ भीतरसे विश्वास न करते हुए भी बाहरसे विश्वस्त पुरुषकी भाँति अपना भाव प्रदर्शित करते हुए शत्रुको सेवा करे। सदा उससे प्रिय वचन ही बोले, कभी कोई अप्रिय बर्ताव न करे ॥ ९ ॥ विरमेच्छुष्कवैरेभ्यः कण्ठायासांश्च वर्जयेत् । यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वनः ॥ १० ॥ तान् द्विजान् कुरुते वश्यांस्तथा युक्तो महीपतिः । वश चोप नयेच्छत्रून् निहन्याच्च पुरंदर ॥ ११ ॥ पुरंदर! सूखे वैरसे अलग रहे, कण्ठको पीड़ा देनेवाले वाद-विवादको त्याग दे। जैसे व्याध अपने कार्यमें सावधानीके साथ संलग्न हो पक्षियोंको फँसानेके लिये उन्हींके समान बोली बोलता है और मौका पाकर उन पक्षियोंको वशमें कर लेता है, उसी प्रकार उद्योगशील राजा धीरे-धीरे शत्रुओंको वशमें कर ले। तत्पश्चात् उन्हें मार डाले ॥ १०-११ ॥ न नित्यं परिभूयारीन् सुखं स्वपिति वासव । जागत्र्येव हि दुष्टात्मा संकरेऽग्निरिवोत्थितः ॥ १२ ॥